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जयशंकर प्रसाद

छायावाद के प्रारंभकर्ता महाकवि जयशंकर प्रसाद हिन्दी साहित्य में सर्वश्रेष्ठ कवि के रूप में प्रसिद्ध हैं। ऐतिहासिक नाटक लिखने वालों में भी जयशंकर प्रसाद किसी से पीछे नहीं हैं। उपन्यासकार के रूप में ये जाने जाते हैं। निबंधकार व आलोचक के नाते भी ये प्रसिद्ध हैं। सन् 1889 ई. में ऐसे प्रतिभाशाली साहित्यकार का जन्म हुआ था। ये सुंघनी साहू वंश से संबंधित थे। परिवार के परंपरागत धंधे में नस्वार बेचना प्रसिद्ध था।
कानन-कुसुम, प्रेम-पथिक, आँसू, महाराणा का महत्व, लहर एवं कामायनी जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध काव्य-कृतियाँ हैं। इसी तरह से विशाख, राजश्री, सज्जन, जनमेजय का नागयज्ञ, अजातशत्रु, स्कन्दगुप्त, चंद्रगुप्त, अवस्वामिनी नाटकों में प्रमुख हैं। काव्य और कला तथा अन्य निबंध निबंध-संग्रह के रूप में प्रख्यात है। कंकाल, तितली, इरावती ऐतिहसिक उपन्यास हैं। छाया, प्रतिध्वनि कहानी-संग्रह हैं।
अक्सर देखा गया है कि जयशंकर प्रसाद के नाटक सामान्य पाठकों के लिए पठनीय नहीं है। न ही मंचित रूप में देखकर भी आसानी से समझ सकता है। आलोचकों के मुख से कहें तो पंत ने कहा है कि कविवर प्रसाद को ही छायावाद का प्रथम कवि मानना उचित होगा।
जयशंकर प्रसाद ने हिन्दी भाषा को सशक्त बनाने के लिए संस्कृत शब्दावली का प्रयोग किया है। इससे हिन्दी भाषा का साहित्यिक रूप निखरा और प्रेम की लाक्षणिक शक्ति का सौंदर्य बढ़ा है।
हम कामायनी महाकाव्य के आरंभ के दो पद्यों में ही देखेंगे कि कितना हृदयस्पर्शी चित्र जयशंकर प्रसाद ने अंकित किया है ।
हिमगिरि के उतुंग शिखर पर बैठ शिला की शीतल छांह
एक पुरुष भीगे नयनों से देख रहा था प्रलय प्रवाह
नीचे जल था ऊपर हिम था
एक तरल थुआ एक सघन
एक तव की ही प्रधानता
कहो उसे जड़ या चेतन।
इसी तरह से आंसू गीतिकाव्य की दृष्टि से उत्तम कृति है। हम निम्न उदाहरण ले सकते हैं-
जो घनीभूत पीड़ा थी,
मस्तिष्क में स्मृति-सी छाई।
दुर्दिन में आँसू बनकर
वह आज बरसने आई।
जयशंकर प्रसाद का व्यक्तित्व बहुमुखी था। इसलिए वे विविध प्रकार के साहित्य की संरचना करते रहे। निराशावादी चेतना का विरोध करते हुए, जयशंकर प्रसाद ने लिखा
प्रकृति के यौवन का श्रृंगार,
करेंगे कभी न बासी फूल।
मिलेंगे जाकर वे अतिशीघ्र
आह! उत्सुक है उनको धूल।।
जयशंकर प्रसाद ने अलंकारों के प्रयोग में अद्भुत क्षमता का परिचय दिया
घन में सुन्दर बिजली सी ।
बिजली में चपल चमक-सी।।
आँखों में काली पुतली ।
पुतली में स्याम झलक-सी।।
उपमा अलंकार का एक दृश्य है।
इसी प्रकार के अलंकारों में रूपक, उत्प्रेक्षा, अनुप्रास, अतिशयोक्ति आदि अलंकारों की छटा अद्भुत रूप में प्रयुक्त है। प्रसाद ने मुक्तकशैली के प्रयोग में निपुणता दिखलाई है। काव्य में प्रतीकों की योजना लालित्यपूर्ण पदों के द्वारा प्रयुक्त कर वे वैभव में चार चाँद लगा दिया करते थे।
सर्वश्रेष्ठ कवि जयशंकर प्रसाद का देहवसान सन् 1937 को हुआ। वे जीवन भर पीड़ा सहते हुए भी साहित्य सर्जना को गंभीरता से लिया। वे भारतीय दार्शनिक चिंतन और राष्ट्रीय विचारधारा से सुदृढ़ किया है और उन्होंने साहित्य को जो साहित्यरत्न प्रदान किए हैं, उनसे हिन्दी साहित्य का भण्डार सदा के अमरता की ओर अग्रसर होते हुए प्रदीप्त रहेगा।

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