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Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

निजीकरण : फायदे और नुकसान

निजीकरणजिसे अंग्रेजी में हम प्राइवेटाइजिंग कहते हैं। एक बहुअर्थी अवधारणा है। जिसके विभिन्न अर्थ निकलते हैं।
संकीर्ण अर्थ पर ध्यान दें तो निजीकरण का अर्थ राज्य के स्वामित्व वाली इकाइयों का संपूर्ण या कुछ इक्विटी को निजी शेयरधारकों को बेचा जाना, राज्य संस्थाओं से जो भी निजी क्षेत्र के उत्पादन की इकाइयों के स्वामित्व का हस्तांतरण और साथ ही निजी प्रबंधन व निजी नियंत्रण की शुरुआत होती है। उसे निजीकरण कहा जाता है।व्यापक अर्थ में, गैर-नौकरशाहीकरण, प्रावधानों और प्रशासनिक निर्देशों का विरुपण, योजना और क्रियान्वयन पर निर्णय के लिए सत्ता का विकेंद्रीकरण, प्रतिस्पर्धा का विकास, सार्वजनिक संसाधनों का निजीकरण, इत्यादि है।
निजीकरण के माध्यम से रुग्ण सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों के कार्यों का नियंत्रण अनुशासनहीन नौकरशाही तंत्र की जगह बाजार तंत्र के अनुशासन द्वारा किया जा सकता है। अक्सर देखा गया है कि सार्वजनिक क्षेत्र के निजीकरण से उत्पादन के समाजवादी पैटर्न में अव्यवहार्य रुग्ण इकाइयों के निकलने के मार्ग प्रशस्त हुए हैं।
विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए भी निजीकरण एक माध्यम है। हाल के सर्वेक्षण में पाया गया है कि जिस किसी भी एशियाई देश में विदेशी इक्विटी आकर्षित होते हैं वही देश अधिक शक्तिशाली बनता है और साथ ही अधिक आत्मनिर्भर भी होता है।
निजीकरण की वकालत करता हुआ बाजार अपने में अलग ही चमक दमक लिए होता है।
निजीकरण के माध्यम से प्राप्त ऋण ब्याज मुक्त तो होता ही है पर इसके दाता। को लाभांश तो देना ही पड़ता है।
निजी उद्यमियों के हाथों में सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों की अचानक सुपुर्दगी ने उस क्षेत्र में अपने आप को दिवालिया तो घोषित कर ही दिया है साथ ही वृहद् पैमाने पर बेरोजगारी का कारण भी बना है। अतः हमें निजीकरण के गुण और दोषों को विवेकपूर्ण विश्लेषण द्वारा हल करने की आवश्यकता है।
हमारे राज्य/राष्ट्र के कुछ प्रमुख उपक्रमों, इकाइयों जैसे कि नागरिक विमानन, डाक सेवा, यातायात और विद्युत क्षेत्र जैसी बड़ी भारी घाटे वाली इकाइयाँ जो कि हमारे राष्ट्रीय राजकोष  पर बोझ थीं निजीकरण के माध्यम से आज फायदे वाली इकाइयों में परिवर्तित हो चुकी हैं।
स्टील, बैंकिंग और बीमे जिसे कंपनियों का संचालन निजी एवं सार्वजनिक दोनों के हाथों में है। जिससे किसी भी प्रकार के निजी लाभ के लिए सार्वजनिक कोष के दुरुपयोग को रोका जा सके।
भूमंडलीकरण के लिए अपने व्यापार के वातावरण में विश्व अर्थव्यवस्था के अनुरुप हम परिवर्तन भी कर सकते हैं। निर्यात उत्पादन के विरुद्ध भेदभाव को भी हम दूर कर सकते हैं।
आज के बाजार की तो माँग ही है भूमण्डलीकरण, निजीकरण आदि
समाचार पत्रों के माध्यम से हमें पता चल जाता है कि आज कौन सी इकाइयों का निजीकरण होने का प्रस्ताव है। हम इस सच को नकार नहीं सकते कि सार्वजनिक  उपक्रमों की तुलना में निजी उपक्रमों की उत्पादन क्षमता व नफा की तुलना अधिक होती
सरकारी मुलाजिम अपने आप को सरकारी दामोद समझ कर मनमाने ढंग से  अपने कार्य को संपन्न करता है पर इसके विपरीत निजी मुलाजिम को अपने कार्य को अपनी पुजा समझ कर करना पड़ता है। सरकारी मुलाजिम को किसी का डर नहीं रहता क्योंकि उसका कारण उसका एक मालिक नहीं। इसी जगह निजीकरण के माध्यम से हम देखते हैं कि जो उपक्रम कभी घाटे में चलते थे कैसे मुनाफे में चलने लगते हैं।
निजीकरण के कई फायदे भी हैं और नुकसान भी हैं। समझदारी इसी में है कि हम नुकसान की भरपाई करने के माध्यम खोज निजीकरण से अधिक से अधिक लाभांश लें।

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