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Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

भारत और दलित

सदियों की गुलामी के बाद जब भारत ने 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त की यह वही ऐतिहासिक क्षण था जब इतिहास ने एक नए चरण में अपने कदम बढाए थे।
पर सत्य तो यह था कि उपलब्ध की गई यह स्वतंत्रता केवल राजनीतिक थी, सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता को तो अभी हमें पाना था।भारत की बहुत बड़ी जनसंख्या को तो सदियों से मानवीय मानकों से नीचे की जिन्दगी ही जीनी पड़ती है। उनको विकास के अवसरों से वंचित रखा गया। अनुसूचित जातियों ने, और उनसे कम कुछ पिछड़ी जातियों ने निर्धनता, दरिद्रता एवं  सामाजिक शोषण की अवर्णनीय यातनाएं झेली थीं। उनकी हैसियत छोटे कार्य जैसे कि पानी भरने, गंदगी साफ करने वालों से बहतर नहीं थी। 
फिर इतिहास करवट ली और स्वतंत्र भारत ने उनके विकास एवं शोषण से मुक्ति दिलवाने की शपथ ली। इन लोगों की दशा सुधारने हेतु स्वयं संविधान में प्रावधान किए गए। अनुसूचित जातियों के लिए विधान सभाओं, लोक सभा और अन्य सेवाओं में आरक्षण रखे जाने के फलस्वरूप उनकी उन्नति और विकास के अवसर प्राप्त हुए।
राजनीतिक क्षितिज पर हुए इस परिस्थितिकारक ने अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ों की आशा और आकांक्षाओं को नया रूप दिया गया। धीरे धीरे इन सब प्रयासों से उनमें राजनीतिक बल बढ़ता गया और वे 1993 में उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में अपनी सरकार बनाने में कामयाब हुए।
मायावती, एक हरिजन नेता का मुख्यमंत्री के रूप में चुना जाना एक महत्वपूर्ण घटना है। और तो और हमारे राष्ट्रपति के रूप में चुने जाने वाले श्री आर.के. नारायण भी एक हरिजन नेता थे। भारत के मुख्य न्यायाधीश तक दलित वर्ग पहुँच। चुका है।
इन सब को देखते हुए हम कह सकते हैं कि इनकी अभूतपूर्व सफलता सत्ता, समाज और देश की अर्थव्यवस्था में अपना उचित स्थान का दावा करने हेतु दलितों के उत्थान का प्रतीक है। हमें इसका स्वागत करना चाहिए, उन लोगों के लिए हमारे समाज में हमें उन्हें सम्मानजनक स्थान दिलवाने का मार्ग प्रशस्त करना है।
हमारे देश में पिछले 55 वर्षों के दौरान देखा कि विश्व भर में किस तरह प्रजातंत्र की हवा जोरों से बड़ी है जिसने तानाशाही शक्तियों को ध्वस्त करके रख दिया है, किन्तु इससे पिछड़ी जनजाति आदि को कोई लाभ नहीं मिला। लोकतंत्र तो केवल समाज के उच्च वर्ग के लिए होता है जो अपनी जिंदगी ठाट-बाट से व्यतीत करते हैं जिनके हाथ में आर्थिक शक्ति केन्द्रित होती है। लोकतंत्र जनता का, जनता के लिए, जनता द्वारा शासन करना अर्थ होता है।
साम्यवाद ने भी दलितों के उद्धार की दिशा में कोई सफलता प्राप्त नहीं की, वास्तव में साम्यवाद तो साम्यवादी दल की तानाशाही मात्र बनकर रह गये। सर्वहारा वर्ग की तानाशाही की धारणा सर्वहारा वर्ग को ही धोखा देने के लिए था।
हमें पिछड़ी जाति, जनजाति के उदय का स्वागत किया जाना चाहिए। जिससे वर्ग-संघर्ष या वर्ग-शत्रुता जैसी घटनाएँ घटित न हो सकें। शासन स्तर पर निर्णय निष्पक्ष रूप से किए जाने चाहिए, जातीय बिंदु विधि के शासन को हमें न्याय के सिद्धांतों के अधीन ही रखना चाहिए। 
दलितों के अधिकारों के दावों की घटना से उत्कृष्टता के दमने का रास्ता नहीं खुलना चाहिए। इससे दलितों के सही विकास का मार्ग प्रशस्त होना, सामाजिक और सांस्कृतिक विकास के रहित राजनीतिक सत्ता की प्राप्ति से कोरी तानाशाही को जो जन्म मिल सकता है, उसे हमें रोकने के लिए हर संभव कदम उठाने चाहिए। इसलिए यह आवश्यक है कि सत्ताधारी इन कायों को पूरा करने की ओर ध्यान दें तभी संभव है। कि दलितों के उत्थान को एक स्थायी वास्तविकता मिल सके।

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