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मीराबाई

कृष्णभक्ति के कवयित्रियों में मीराबाई का स्थान सर्वश्रेष्ठ है। माना जाता है। कि मीराबाई का जन्म सन् 1563 ई. में राजस्थान के मारवाड़ जिलान्तर्गत मेवाच में हुआ था। मीराबाई श्रीकृष्ण के लिए मधुर-मधुर गीत गाती रहीं। कहा जाता है कि बचपन में एक बार मीराबाई ने खेल-ही-खेल में भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति को हृदय से लगाकर उसे अपना दूल्हा मान लिया। तभी से मीराबाई आजीवन श्रीकृष्ण को अपने पति के रूप में मानते हुए प्रसन्न करने के लिए मधुर-मधुर गीत गाती रही। श्रीकृष्ण को पति मानकर अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत कर देने वाली मीराबाई को जीवन में अनेक कष्ट झेलने पड़े थे, फिर भी मीराबाई ने अपनी इस भक्ति-भावना का निर्वाह करने से कभी मुह नहीं मोड़ा।
मीराबाई का जीवन पारलौकिक था। यद्यपि मीराबाई के आरंबिक जीवन में उन्हें लौकिक जीवन जीना पड़ा। फिर भी पति भोजराज की अल्पायु मृत्यु हो जाने के कारण मीराबाई का मन बैरागी बन गया। मीराबाई को सामाजिक बाधाओं और कठिनाइयों को झेलने के लिए अपने आराध्य देव श्रीकृष्ण की बार-बार शरण लेनी पड़ी थी। कहा जाता है कि अपने अंत समय तक मीराबाई ने विभिन्न प्रकार की साधनाएँ की हैं।
मीराबाई द्वारा रचित काव्य-रूप का जब अध्ययन किया जाता है तो हम यह देखते हैं कि वे हृदय-पक्ष से सभी स्वरूपों में प्रवाहित थीं। जिनमें सरलता और स्वच्छंदता है साथ-साथ भक्ति के भी विविध भाव हैं। आत्मानुभूति और निष्ठता की तीव्रता है। श्रीकृष्ण की अनन्य उपासिका होने के कारण वे अपना सारा कार्य उन्हें ही समर्पित करती थीं। वे श्रीकृष्ण की मनोहर मूर्ति को अपने हृदय में बसायी हुई कहतीं

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