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Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

एक विद्यार्थी की आत्म-कथा


जीवन परिचय : आज से 22 वर्ष पूर्व मेरा जन्म एक निर्धन ग्रामीण। परिवार में हुआ था। परिवार में केवल पिता ही थोड़ा-बहुत पढे लिखे थे। घर-गृहस्थी कृषि पर चलती थी। समय और समाज की परिवर्तन स्थिति से उनका शिक्षा के प्रति अनुराग बढ़ गया। फलत: मेरे जन्म के दिन ही मुझे समाज का एक सभ्य एवं शिक्षित प्राणी बनाने का निश्चय 2. बचपन और प्राथमिक शिक्षा कर लिया। पाँच वर्ष की अवस्था तक उन्होंने मुझे अक्षर ज्ञान करा दिया।

बचपन और प्राथमिक शिक्षा : छः वर्ष की अवस्था में मुझे गाँव की पाठशाला में प्रविष्ट करा दिया गया। सुन्दर और पढ़ने में तेज होने से शीघ्र ही अध्यापक महोदय का कृपापात्र बन गया। पिता जी मेरे स्कूल चले जाने पर कृषि का काम-काज देखते । दोपहर को स्कूल से लौटने पर मैं भी पिता के साथ ही खेत पर भोजन करता । संध्या समय पिता के साथ तालाब की ओर सैर के लिए जाता । वहीं पर मैंने उनसे छोटी अवस्था में ही तैरना सीख लिया। गाँव के सामाजिक एवं धार्मिक उत्सवों में भाग लेने के कारण वहाँ के प्रतिष्ठित जनों का भी प्रिय बन गया।। कक्षा में मैं सदैव प्रथम रहता था।
पिता की मृत्यु : प्राथमिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद ही मैं। स्वावलम्बी बन गया। मुझे 25 रुपये मासिक छात्रवृत्ति मिलने लगी। साथ ही विद्यालय शुल्क और छात्रावास की शुल्क माफ कर दी गई। मेरे अन्य खर्चे के लिए ये रुपये उस समय काफी थे। माध्यमिक कक्षाएँ भी मैंने प्रथम श्रेणी में पास कीं। मेरी इस सफलता से पिता जी बहुत प्रसन्न हुए; पर उनकी यह प्रसन्नता मैं अधिक दिन न देख सका। एक दिन संध्या को नाग देवता के दर्शन ने उन्हें हमसे छीन लिया। परिवार पर आई इस आकस्मिक आपदा से मेरा दिल बैठ गया पर साहस न छोड़ा।
उच्च शिक्षा का प्रयास : अन्य परीक्षा के समान मैं मिडिल बोर्ड की परीक्षा में भी प्रथम आया। उन दिनों हमारे जमींदार के छोटे सुपुत्र पास के ही नगर में एम०ए० का अध्ययन कर रहे थे। पिता जी के साथ मैं कभी-कभी उनकी हवेली में जाया करता था। छुट्टियों में गाँव आने पर उनसे वहाँ भेट होती थी। इस बार जब वे गाँव आये, तो मैंने अपनी स्थिति और उच्च शिक्षा पाने की इच्छा से उन्हें अवगत कराया। वे छुट्टियों के बाद मुझे अपने साथ शहर ले गए और वहाँ उच्चतर माध्यमिक विधालय में मेरा नाम लिखवा दिया। मेरी संरक्षकता का सारा भार उन्हीं पर रहा। मैंने दसवीं कक्षा प्रथम श्रेणी में पास कर ली।
स्वावलम्बन की ओर : छात्रवृत्ति न मिल सकने के कारण कॉलेज में प्रवेश पाना असम्भव-सा लगने लगा। कॉलेज का खर्च अधिक और आय के कोई साधन नहीं। छोटे जमींदार पर और बोझ बनना उचित नहीं समझा। माता भी अब चाहने लगी थीं कि मैं परिवार के खर्चे में उनका हाथ बटाऊँ। ऐसी स्थिति में मैंने कॉलेज प्रवेश का विचार त्याग कर एक प्रेस में नौकरी कर ली। सारा दिन नौकरी में बीतता और रात्रि भावी जीवन के सपनों में। प्रेस के स्वामी दयालु व्यक्ति थे। वे मेरे कार्य से सन्तुष्ट थे। उन्होंने मुझे आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया। मुझे सम्बल मिला और मैं इस प्रकार एफ० ए० और बी०ए० की परीक्षा पास कर गया।
सरकारी पद पर : मैं बी०ए० प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ। मैं इसके बाद सरकारी नौकरी की खोज में लग गया। प्रेस में कार्य करते हुए कई सरकारी पदापों से परिचित हो गया था। उनमें से एक की मुझ पर विशेष कृपा भी हो गई थी। घर आना-जाना भी हो गया था। उनकी लड़की एफ०ए० की छात्रा थी। देखने में सुन्दर और सुशील। सारा परिवार आधुनिक विचारों का था। उन्हीं के प्रयास से मुझे अच्छी सरकारी नौकरी मिल गई। कुछ ही महीनों में मेरी काया पलट गई। मैंने अच्छा-सा घर लेकर माँ और भाइयों को अपने पास बुलवा लिया। ज़मीनादि व गाँव का घर बेचकर शहर में ही छोटा-सा प्लाट ले लिया। हमारे दु:खों के बादल छंट गये थे। सुख ने आसरा दिया था और साथ ही माँ की सेवा करने का मौका भी । छोटे दोनों भाइयों की शिक्षा सुचारु रूप से चलने लगी।
विवाह : इस नौकरी के लगभग एक वर्ष बाद वे महानुभाव अपनी इकलौती योग्य बेटी का रिश्ता लेकर मेरी माँ के पास आ गए। माँ ने बहुतेरा कहा कि हम आपके योग्य नहीं हैं; पर उन्होंने सब बातों का यही उत्तर दिया कि बहन जी हमें अच्छे घर-बार की आवश्यकता नहीं, हमें तो सच्चरित्र एवं योग्य लड़के की आवश्यकता है। सो ये गुण आपके बेटे में विद्यमान हैं। अन्त में इसका निष्कर्ष यह निकला कि उनकी सुन्दर एवं सुशील कन्या अगले मास में ही मेरे घर की गृहलक्ष्मी बनकर आ गई। इसके बाद, तो मेरा गृहस्थी-जीवन और भी सुखमय हो गया।
उपसंहार : संक्षेप में मैं यही कह सकता हूँ कि मैंने अपना विद्यार्थी जीवन पूर्ण स्वावलम्बन से समाप्त किया। भगवान् ने हर समय हर स्थिति में मेरा साथ दिया। मेरा परिवार किसी न किसी प्रकार सुखमय जीवन गुजारता रहा। मैं अपनी शिक्षा के साथ-साथ भाइयों की शिक्षा भी पूर्ण कर पाया । मुझे देखकर अनेक सम्बन्धित जनों को प्रेरणाएँ मिलीं. बल मिला और प्रोत्साहित हुए

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