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Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

पुस्तक की आत्म-कथा


निबन्ध-रूपरेखा प्रस्तावना : पुस्तक मानव की सच्ची साथिन है। यह अपने अक्षय कोश से उसकी ज्ञान पिपासा को शांत करती है। मानव ने उसे जन्म देकर एक अमर निधि प्राप्त कर ली है। इसकी सृष्टि मानव की तपस्या और साधना का फल है। इसीलिए उसने मानव के लिए अपने हृदय के द्वार खोल रखे हैं। उसे ज्ञान-विचारों का सदा दान देती रहती है।
जन्म से पूर्व : आज मैं ज्ञान-विचारों की अतुल सम्पति को समेटे हुए पुस्तक रूप में हूँ; किन्तु जन्म से पूर्व मैं केवल सूक्ष्म विचारों के ही रूप में थी। मेरा यही रूप स्रष्टा के हृदय में तरंगित हुआ करता। था। एक दिन वह मुझे भाषा तथा शब्दों के सूत्र में गूंथने लगा। मैं स्वयं भी उससे प्रसन्न होकर उसकी भाषा तथा शब्दों के भीतर बैठ गई। उसके शब्दों में एक झंकार उत्पन्न हो गई। वह स्वयं उस रचना पर नाच उठा और अपनी कृति समझकर गर्व करने लग गया।
प्राचीन स्वरूप : सृष्टि के आदिकाल में तो मेरा स्रष्टा बड़ी-बड़ी शिलाओं के ऊपर चित्रों तथा तस्वीरों में ही मेरा निर्माण करता था। आज भी मेरे उस रूप को शिलाओं पर या गुफाओं में देखा जा सकता। है। अब मुझे भी अपने प्राचीन स्वरूप को देख कर महान् आश्चर्य-सा होता है। आज के रूप तक पहुँचने के लिए मुझे न जाने कितने परिवर्तनों के झको सहने पड़े हैं ? जब मानव भाषा और शब्दों का धनी बना तथा उसने लेखन कला में भी प्रगति की, तो वह मुझे ताड़ व भोज पत्रों पर लिखने लगा। आज भी अजायबघरों में मेरा यह स्वरूप सुरक्षित है। इसके पश्चात् मैंने कागज के युग में प्रवेश किया।
सबसे पहले कागज पर चीनियों ने लिखा; क्योंकि इन्होंने ही सब से पहले कागज का आविष्कार किया था। कागज के निर्माण और मुद्रण कला की प्रगति ने मेरे रूप में कायाकल्प ला दिया। मेरा प्राचीन रूप बिल्कुल बदल गया है। मैं नए-नए सुन्दर रूपों में अपने पाठकों के सामने आने लगी। सुन्दर और चिकने कागज पर छपने से मेरा रूप और निखर उठा है। मेरा आवरण भी नयनाभिराम बनने लगा है। मेरी जिल्द भी सुदृढ़ होने लगी है। आज भी मैं पूर्व की भाँति ही सूक्ष्म विचारों और भावों के रूप में अपने स्रष्टा के मन-मानस से खेलती हूँ। मेरा स्रष्टा लेखक, कवि, इतिहासकार, कहानीकार, उपन्यासकार, नाटककार और निबंधकार तथा एकांकीकार कहलाता है। मेरा लेखक पहले अपने विचारों और भावों को लेखनी द्वारा कागज पर लिपिबद्ध करता है। मेरा यह प्रारम्भिक रूप ‘पांडुलिपि’ कहलाता है।
प्रेस में : मेरे आज के स्वरूप को पूरा करने के लिए पांडुलिपि । को कम्पोजीटरों के हाथों में दिया जाता है। वे मुझे टाइपों के सूत्र में गॅथते हैं। फिर एक-एक फार्म को मशीन पर छपने के लिए भेज दिया जाता है। मैं मशीन पर फार्म के रूप में छपती जाती हूँ। छपने पर सभी फार्म पृथक्-पृथक् रहते हैं। जब में पूरी छप जाती हैं, तो दफ्तरी के हाथों में पहुँचती हूँ।
दफ्तरी के हाथों में : दफ्तरी एक-एक फार्म को मोड़ता है। सभी फार्मों को मोड़कर मेरे पूरे शरीर के फार्मों को इकट्ठा करता है। जिल्द बाँधने के बाद आवरण चढ़ाया जाता है। इस पर मेरा और लेखक का नाम सुन्दर अक्षरों में लिखा रहता है।
दूकानों में : पूरी तरह सज-धज कर मैं दूकानों की अलमारियों में पहुँचती हूँ और फिर अपने पाठकों के हाथों में पहुँच कर उनकी अलमारियों में स्थान पाती हूँ। उनका उपकार मानती हूँ। पाठकों से बढ़कर मेरा सच्चा साथी और कोई नहीं है। मैं उनके अन्दर आनन्द और उत्साह का संचार करती हूँ।
उपसंहार : यदि मुझे अपने पास रखोगे, तो मैं तुम्हें ज्ञान देंगी, विचार देंगी और तुम्हारे भीतर वह भाव पैदा करूंगी जिससे तुम महान् बन सकोगे ।

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