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Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

अधिकार नहीं, सेवा शुभ है


प्रस्तावना : सेवा मानव हृदय में जीवोपकार की पावन भावना भरकर उसे दीन-हीन प्राणियों की पीड़ा दूर करने को प्रेरित करती है और अधिकार मनुष्य को दूसरों पर शासन करने तथा आज्ञा पालन कराने का अधिकार देता है। सेवा की प्रेरणा से मानव हृदय में निष्काम-कर्म भावना की जागृति होती है और मनुष्य दयार्द्र, गद्गद् हृदय, छल-छल पुतलियों, शुभचिन्तनापूर्ण इच्छाओं, कुशलक्षेम की अभिलाषाओं से पीड़ित और दुखियों की सहायता सुश्रुषा करता है तथा अधिकार पाकर मनुष्य अभिमान और दम्भ, कामना पूर्ण इरादों से दूसरों से कार्य कराता हैं।
सेवा का महत्त्व : सेवा स्वत: सम्पूर्ण और स्वाधीन है। इसे किसी अवलम्बन, सहायता अथवा आज्ञा की आवश्यकता नहीं सच्चा प्राणी-सेवक निष्काम और स्वाधीन है। उसे सेवा करने के लिए किसी की प्रेरणा नहीं चाहिए, किसी का आदेश नहीं चाहिए, मूल्य नहीं चाहिए, वह अपनी सेवा का पुरस्कार प्रसिद्धि और उपहार अथवा पद के रूप में पाने की इच्छा नहीं रखता। सेवा का पुरस्कार तो स्वयं सेवा हैवह आत्मानन्द है, जो उसे प्राणियों की सेवा करने से प्राप्त होता है। सेवा का मूल्य तो यही है कि उसके द्वारा पीडित की पीड़ा दूर हो जाये। सेवा के चरणों में प्रसिद्धि लौटती है। ख्याति चरण- धूलि को अपने मस्तक पर लगाती है, सामाजिक उच्च पद उसके पदों से पतित होने के लिए उतावले रहते हैं। सेवा उनकी अपेक्षा नहीं करती, हाँ स्वीकार करती है, तो इसलिए कि इनके द्वारा वह अपने शीतल वरद आशीर्वाद को और भी विस्तृत क्षेत्र में बरसा सके।
सेवा और अधिकार : सेवा तो स्वयं अपने में पूर्ण तथा स्वाधीन। है; पर अधिकार बिना सेवा के भयंकर दैत्य बन जाता है। सेवा के संकेत चिह्नों पर चलकर ही अधिकार जनहित कर सकता है। सेवा की संगति से अधिकार की पूजा की जाती है। सेवा के आशीर्वाद से अधिकार मानव-हृदय का प्रिय बन जाता है। जहाँ अधिकार कोरा अधिकार हुआ, वहाँ दम्भी दुराभिमानी और अपकारी बन कर विश्व का घृणा भाजन बन जाता है। प्राचीन काल में अधिकार सेवा का सेवक था, आज्ञाकारी था, अधिकारियों के हृदय में सेवा-भावना की प्रधानता थी और वे सदा के लिए अधिकार का जंजाल मोल लेते थे। राम अधिकारी नहीं सेवक थे। तभी तो मानत से देवता बन गए। अब अधिकार में सेवा की प्रेरणा नहीं, तभी तो वह आज आतंक का प्रतीक और अत्याचार का आधार बन गया है।
सेवा और त्याग : सेवा त्याग की जननी है और अधिकार प्राप्ति का पति। जो आत्मानन्द त्याग प्रदान करने में है, वह क्या प्राप्ति में हो सकता है। देने वाला दाता और धनी है और मांगने वाला, प्राप्त करने वाला एक भिक्षुक ही। दाता त्यागी संसार की श्रद्धा-भक्ति प्रेम और शुभ-चिन्तन का अधिकारी बनता है तथा चाहने व प्राप्त करने वाला, उपेक्षा का पात्र। त्याग के कारण आज भी बलिदानियों के मुकुटमणि हैं और प्राप्त करने के कारण विष्णु आज भी ‘वाभन’ कहलाते हैं।
विश्व के उत्पीड़न, कष्ट, अत्याचार और अन्याय सभी का जनक है, अधिकार। दैत्य और शान्ति, सुख, समृद्धि-समानता की माता है सेवा। विश्व में आज इतना संघर्ष क्यों ? विश्व आज अधिकार शैतान का उपासक बन उसे प्राप्त करने को पागल हो उठा है। विश्व के सिर पर अधिकार लिप्सा का भूत बुरी तरह सवार है। इसी अधिकार दैत्य की प्राप्ति के लिए अबीसीनिया के काले मानव भून डाले गये। स्पेन में रणचण्डी का खप्पर भर गया। पोलैण्ड में बर्बरता का नग्न नृत्य हुआ। इसी अधिकार के कारण देश-देश में संघर्ष है, स्थान-स्थान पर अशान्ति है और घर-घर में कलह है। जो गृहस्थ त्याग और समर्पण सेवा और देने की भक्ति पर अचल खड़े थे, आज अधिकार की आँधी ने उनकी जड़े हिला दी हैं। इसी अधिकार ज्वाला में आधुनिक दम्पति भस्म हो रहे हैं।
अधिकार का मद : अधिकार जब अपने नग्न रूप में आता है, तो निर्धनों और निर्बलों की सूखी ठठरियों पर गोलियों की वर्षा करता है, अस्थि-पंजरों को लाठियों से धुन देता है, सेवा के भूखे पीडित जनसमूहों को रौंद देता है और यही अधिकार अपने अभिमान तथा पागलपन की उन्मत्तता में विश्व इतिहास के पृष्ठों पर रक्त से हँगी कथाओं का चित्रण करता है। अधिकार का नशा होता है, जो मानव को राक्षस बना देता है।
सेवा से लाभ : सेवा जब अपने वास्तविक रूप में आती है, तो विश्व में आशीर्वादों की वर्षा होती है। पीड़ितों के सिसकते उच्छ्वास इसकी शीतल स्निग्ध मुस्कान छूकर मुस्करा उठते हैं। आततायी और अत्याचारों द्वारा सताये दीन-हीन की भीनी पलकें, हँस देती हैं और घबरायी साँसों में संतोष और विश्राम की विश्रांति आ जाती है। इसी अधिकार शैतान का संताया, अधिकार दैत्य का रौंदा हुआ मानव सेवा के शीतल आँचल की छाया में विश्राम लेता है।
अधिकार विध्वंस का विधाता, सर्वनाश का स्रष्टा, अभिशाप का आधार, उत्पीड़न का जनक और दु:खों का भ्राता है। उधर दया देवी, शांति सुख की सृजनहारी, विश्व प्रेम की प्रेरक शक्ति, आशीर्वादों की अधिष्ठात्री और एकता समानता, मानवता की ममतामयी जननी है। जिस दिन विश्व अधिकार की उपासना छोड़ सेवा के श्रद्धास्पद चरणों में नतमस्तक होगा और इनकी आराधना करेगा, उस दिन सेवा की देवी अपना वरद-पाणि पल्लव पसार कर सुख, शान्ति तथा समृद्धि का वरदान देगी। तभी विश्व में हम स्वर्ण युग के दर्शन करेंगे। वसुधा पर स्वर्ग का निर्माण तभी होगा जब मानव अधिकार को छोड़ सेवा में रत होगा।
उपसंहार : अधिकार के साथ सबसे बड़ी बात यह है कि अधिकार मद को पैदा करता है और मद व्यक्ति के मन को उपेक्षा की सीख देताहै। वह अपने को महान् एवं औरों को छोटा समझने लगता है। स्कन्दगुप्त में प्रसाद जी ने कहा है, “अधिकार सुख मादक और सारहीन है।” यह इसी बात का द्योतक है कि अधिकार से मानव-मानव से दूर होता है। अनेक प्रिय सम्बन्ध छूट जाते हैं। अत: यह ध्यान रखना चाहिए कि अधिकार के साथ कर्तव्य और सेवा की भावना होना आवश्यक है।

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