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Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

रुपये की आत्म-कथा


विषय प्रवेश : रविवार का दिन था। कार्यालय से छुट्टी थी। मैं लान में बैठा समाचारपत्र देख रहा था। मेरे समीप ही श्रेय बैठा हिसाब का काम कर रहा था। सहसा वह पूछ उठा कि रुपया कैसा होता है बाबा जी? मैं किसी विशेष समाचार को पढ़ने में तल्लीन था। उसकी ओर। ध्यान न दे सका। लेकिन मेरी चुप्पी तीन वर्षीय बच्चे की जिज्ञासा को शांत न कर सकी। वह पूछता ही रहा। अन्त में विवश होकर मझे कहना ही पड़ा, “क्या तुमने अभी तक रुपया नहीं देखा ?” “नहीं, तो बाबा जी।” सहसा मुझे ध्यान आया कि कल डबल रोटी वाले से दस का नोट तुड़ाने पर नोटों के साथ एक रुपया भी मिला था। मैंने उसे कोट की जेब में से पर्स जाने के लिये कहा। श्रेय तत्काल दौड़ा हुआ अन्दर गया और मेरा पर्स ले आया। मैंने उसमें से रुपया निकालकर श्रेय को देते हुए कहा, “यह है रुपया ।”
उसने उस गोल-गोल धातु निर्मित चमकीली चीज को उलट-पलट कर, देखा। वह उसे बड़ा भाया । कुछ क्षण बाद वह बोला, “इसे मैं रख लें, बाबाजी” “तुम्हीं रख लो।” मेरा उत्तर सुनकर श्रेय बड़ा प्रसन्न हुआ। उसे बार-बार उछाल-उछालकर पुलकित होने लगा । सहसा वह उसके हाथ से छूटकर फर्श पर गिर गया और लुढ़कता हुआ एक पौधे । के सहारे खड़ा हो गया। तब मुझे उसका धीमा-सा स्वर सुनाई दिया। मैं श्रेय को समीप बैठाकर उसे सुनाने लगा । समाचारपत्र वैसे ही हाथ में रह गया। वह कह रहा था।
पूर्व जीवन चाँदी की खान : बाबू जी ! यह दुनिया कितनी परिवर्तनशील है ? इसमें जिसने जन्म लिया है उसे दु:ख सुख सहन करने पड़ते हैं। चाहे कोई राजा हो चाहे कोई रंक। इस दु:ख-सुख की चक्की से किसी का छुटकारा नहीं। मैं भी इस चक्की में पिसा हूँ। आज इसकी स्मृति मात्र से मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कलेजा ऊपर को आने लगता है। आज मैं अपनी आत्म-कथा आपको सुना रहा हूँ। हाँ, तो बाबू जी ! मेरी जन्म तिथि के विषय में विभिन्न मत हैं। सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा ने सृष्टि रचना के समय ही हमें साहसी पुरुषों के पुरस्कार हेतु छिपा कर रख लिया था। हमारा प्रारम्भिक आवास स्थान अफ्रीका की कांगो नदी के उत्तर की ओर था। कुछ मनचलों ने हमारी अखण्ड समाधि का अनुमान लगा लिया और इसके साथ ही असंख्य कुदाल और बेलचों ने धारा के गर्भ को चीर कर बाहर निकाल लिया।
खान से बाहर आना : इसके बाद हमें परीक्षा स्वरूप अनेक प्रकार की यातनाओं को सहन करना पड़ा। हमें परिवार के अन्य सदस्यों लोहा, ताँबा और पीतल आदि से पृथक् कर दिया गया। दहकती हुई भट्ठियों में डालकर असह्य पीड़ा दी गई; किन्तु इस पीड़ा के बाद सुखद आनन्द का अनुभव-सा हुआ। इसका कारण था हमारा चमकीला रूप इसके समक्ष समस्त कष्ट विस्मृत हो गए। बक्सों में बन्द होकर जलयान की यात्रा पर निकले। इस यात्रा में भी एक विशेष प्रकार के सुख का अनुभव हुआ। कई मास सागर की उत्ताल तरंगों में ही बीत गए। अन्त में हमारा जलयान बम्बई के बन्दरगाह पर जाकर रुका। वहाँ से हमें ठेलों पर चढाकर भारतीय सरकार के टकसाल गृह में भिजवाया गया। यहाँ हमें अत्यधिक सम्मान मिला और हमारे गुणों की जाँच-पड़ताल हुई।
टकसाल : इस घटना के कुछ दिनों के बाद मेरी भी बारी आ गई। भावी आशंका से मैं भयभीत था, पर था परबस । मुझे सबसे पहले अग्नि में खूब तपाया गया। तत्पश्चात् मेरा रूप परिवर्तित किया गया। पुन: मेरे अंग-प्रत्यंग को तराशा गया। छोटे-छोटे टुकड़े किये गए। यह पीड़ा अत्यन्त ही असह्य थी। इससे छुटकारा नहीं था और न ही मेरा कोई दर्द सुनने वाला वहाँ था। अन्त में मुझे साँचे में ढाला गया। मेरे एक ओर चित्र अंकित किया गया और दूसरी ओर जन्म तिथि। इस प्रकार मैंने मायावी दुनिया में पदार्पण किया और लोलुप दृष्टि से सभी ने मुझे निहारा।
जीवन के आनन्द और सैर : हमारे सभी बन्धुओं को एकत्रित कर एक लोहे के सन्दूक में बन्द कर दिया गया। इस बन्धन से मुझे क्षोभ-सा हो गया। सुन्दर रूप पाकर भी कैद की यातना सहन करनी पड़ रही थी। कुछ क्षण के बाद हमारे सन्दूक ठेले में लाद कर स्टेशन पर लाये गए और रेलगाड़ी के एक डिब्बे में चढ़ा दिये गए। यह मेरी प्रथम रेल यात्रा भी।
हमारी यह रेल यात्रा दिल्ली रेलवे स्टेशन पर समाप्त हुई। वहाँ से रिजर्व बैंक के भवन में पहुँचाया गया। वहाँ के कर्मचारियों को हमारे ऊपर विशेष दया आई और उन्होंने हमें बन्धन मुक्त कर दिया। तत्पश्चात् एक लोहे के भवन में यथास्थान रख दिया गया। कुछ अवधि उपरांत मुझे वहाँ से अन्य साथियों के साथ निकाला गया और एक धनाढ्य व्यक्ति के हाथ में सौंप दिया। मुझे इस स्वछन्द वातावरण में साँस लेने का अवसर मिला; किन्तु इस कुबेर के पुत्र ने मुझे बैंक के सीमेंट के फर्श पर पटक-पटक कर बुलाया, तो मेरे क्रोध का पारावार न रहा। वहाँ से भागने का प्रयास किया पर उसने भी मुझे अपने पर्स में डाल लिया और शेष साथियों को एक कपडे की थैली में।
बैंक से चल कर वह कुबेर पुत्र एक हलवाई की दुकान पर पहुंचा। मुझे उसने कुछ मिठाई के बदले में वहाँ छोड़ दिया। हलवाई ने मुझे उठाकर अपने केशबॉक्स में डाल दिया। यहाँ पर मुझ सरीखे और भी कितने ही थे। उनमें से कुछ तो बड़े अनुभवी से प्रतीत हो रहे थे। उनके जीर्णकाय पर दुर्बलता के चिह्न अंकित थे। मुख निस्तेज और विरक्त-सा प्रतीत होता था। मुझे उन पर दया उमड़ आई; किन्तु उन्होंने धीमे स्वर में मुझे सम्बोधित कर कहा, “तुम अभी-अभी बाहर से आए। हो, कुछ समय बाद तुम भी हमारी ही अवस्था के हो जाओगे।” उनके इस कथन से मुझे कुछ ठेस पहुँची। मेरी आकांक्षाओं पर तुषारपात हुआ;। पर वह कटु सत्य निकला, जिसका आभास मुझे आगे चलकर हुआ।
एक दिन उस हलवाई का पुत्र मुझे लेकर एक फल वाले के पास पहुँचा और मुझे देकर आम और संतरे ले आया। इसके बाद तो मुझे कितने ही घर झाँकने पड़े ? कभी पंसारी के यहाँ, कभी कैमिस्ट की। दूकान पर, कभी किसी सुन्दरी के पर्स में, तो कभी किसी देहाती की अन्टी में इस अवस्था में मुझे कुछ अनुभव के साथ-साथ आनन्द भी मिला। मैंने मानव की अनेक प्रवृत्तियों का खूब अध्ययन किया। सारे कार्य मुझसे ही सधते थे। इस विचार ने मेरे हृदय में गर्व के अंकुर उपजा दिये थे। जिसके पास मैं चला गया वह पुलकित हो उठा। श्री बेचन शर्मा उग्र ने मेरी बड़ी प्रशंसा की। उनका मैं आभारी हूँ। उनका कथन है-
“मैं लड़कों का लड़कपन का खिलौना हुँ । मिठाई हूँ। मैं जवानों की जवानी की जान हूँ। मैं बूढों की बुढौती की लकड़ी हूँ, सहारा हूँ। मैं रुपया हूँ।”
“जमींदार मैं हूँ, राजा मैं हूँ, बादशाह मैं हूँ, बादशाहों का बादशाह मैं ईश्वर हूँ। मैं रुपया हूँ।”
परन्तु एक बार अत्यन्त दु:खद घटना घटी। एक कंजूस ने मुझे धरती के एक भाग में गाड़ दिया। वहाँ भूगर्भ में मैं दु:खी रहने लगा। किन्तु एक बार उस कंजूस की मृत्यु के बाद उसके लड़के ने मुझे इस बन्धन से मुक्त किया। इस प्रकार मुझे पुनः पर्यटन का अवसर मिला।
कल डबलरोटी वाले के पास से आपके पर्स में आ गया और अब आपसे श्रेय के हाथ में । इससे मुझे कितना दुलार मिल रहा है। इस स्वच्छन्द प्रीति में मुझे अपनी स्वच्छन्दता का आभास हो जाता है।
उपयोगिता : इस बात की मुझे अवश्य खुशी है कि कागज़ के नोटों का प्रचलन होते हुए भी आज भी मेरा मान है। लोग धार्मिक पर्वो पर पूजन करते हैं। विवाह उत्सवों पर मेरी भेंट चढ़ाते हैं। भगवान् की प्रतिमा पर चढ़ाया जाता हूँ। इससे मेरी उपयोगिता का आभास हो जायेगा।
उपसंहार : इतना कहकर रुपया चुप हो गया। श्रेय ने उसे उठा लिया और उल्लास में वह वहाँ से भाग गया। कुछ क्षण तक मैं रुपये के कथन के विषय में विचार करता रहा। कितनी सत्यता थी उसके कथन में कि इस विश्व में आकर सभी को संघर्षों से गुजरना पड़ता है। तभी श्रीमती जी का चाय का निमंत्रण मिला और मैं उठकर अन्दर चला आया।

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