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Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

सबै दिन जात न एक समान


प्रस्तावना : जब हम यह कहते हैं कि सबै दिन समान नहीं होते तो हमारा तात्पर्य होता है कि व्यक्ति हर दिन एक-सी दशा में नहीं रहता और उसके दिनों में परिवर्तन होता रहता है।
दिनों की परिवर्तनशीलता : हेमन्त आता है सुमनों की क्यारियाँ, तुषार आघात से झुलस जाती हैं। वृक्ष पुष्प-पत्र हीन होकर करुण उच्छ्वास लेने लगते हैं। सृष्टि में दीनता, कुरूपता और करुणा दृष्टिगत होने लगती हैं। प्रकृति-परी उजड़ी विधवा-सी दीखने लगती है। उसके अंचल में होते हैं मृत पत्र, उसकी साँसों में होते हैं करुण निश्वास, उसके मुख पर उड़ती है धूल-सी ! पर यह क्या सदा ऐसा ही रहता है ? नहीं, ‘सबै दिन जात न एक समान’, नव वसंत आता है, क्यारियों की गोद फूलों से भर जाती है। वृक्ष-लता-कुंज लहलहाने लगते हैं। प्रकृति-परी के उच्छ्वास में नशा ऊँघने लगता है, अंचल से पराग उड़ने लगता है, अधरों पर मुस्कान खेलने लगती है और वह नव-यौवन, मुग्धबाला-सी सृष्टि में पुनः माया की छाया बिखराने लगती है।
काली-काली कजरारी रातें, नभ में गरजते घमण्डी बादल, उनके आँचल में तड़पती बिजली, साँय-साँय करती पुरवैया और झन-झन बरसते भीम तीर-नव बलायें भयातुर हो काँप-काँप उठती हैं। घर जाते बटोहीशरण लेते हैं और उधर पथ हेरती सखियों की आँखें सावनी अँधियारी में प्रवास लोक गए प्रीतम की छाया खोजती और उनके कान पगध्वनि तलाश करते हैं। आतुर-गतावली, आकुल-व्याकुल रोमांचित-कम्पित यह सावनी अँधियारी सदा तो नहीं रहती। दुखदायी अभिमानी घन सदा तो नहीं गरजते। वियोगिनियों के उच्छ्वास प्रकम्प अंधकार पट को चीर, किसी को खोजते सदा तो परेशान नहीं होते। वह समय भी आता है, जब गुलाबी प्रभात और रजत रजनियाँ आती हैं। वियोग की कम्पित कथाएँ, रोमांचित रातें और असफल प्रयत्न भुला दिये जाते हैं। मिलन की बेला में फिर अतृप्त आकांक्षाओं का मेला लगता है और मादक विश्व की सृष्टि होती है। करुण अश्रु-कण स्नेह-सीकर बन मुस्कराते  हैं।
सुख-दुःख का आवागमन : दु:ख के बाद सुख और वियोग के बाद संयोग, सृष्टि का अचल नियम है। इसे तोड़ कौन सकता है? परिवर्तन सृष्टि का अटल नियम है। प्रतिक्षण सृष्टि का सूक्ष्म से सूक्ष्म परमाणु स्पंदित होता रहता है। चाहे हमारे धर्म-चक्षु उसे न देख सकते हों। सब समय एक-सा नहीं रहता, यह अमर सत्य है।
यदि सदैव दीन-दुखियों के उच्छ्वास अम्बर से टकराते रहें, करुण क्रन्दन क्षितिज के पार प्रतिध्वनित होते रहें, धुंधली आँखों से अश्रुधाराएँ प्रवाहित होती रहें और जीवन से निराश, फिर सुखी भविष्य प्राप्त करने में असफलता अनुभव करने वाला, वेदना के सघन तम-पट को चीर प्रकाश पाने में अयोग्य समझने वाला अपने दुर्भाग्य दुर्देव को अमर साथी समझने वाला संसार में किस अवलम्बन से रहे। परिवर्तन ही दु:ख के पश्चात् सुख की आशा ही, अंधकार के बाद प्रकाश की आशा ही तो उसे धीरज देते हैं और वह जीवन धारण करता है। यदि सब दिन एक समान रहें, तो सृष्टि में निराशा का साम्राज्य हो जाए और सृष्टि-कर्ता के प्रति भयंकर विद्रोह तथा अराजकता ही आत्म-हत्या एक मात्र औषधि रह जाए। उस परम शक्तिवान् भगवान् का यह अन्याय ही है। सब दिन यदि एक से रहें, तो बड़ा अस्वाभाविक हो।
विश्व का विकास इसी से होता है कि सभी दिन एक से नहीं जाते। दीन-हीन अभाव-पीडित मनुष्य तो सुख-समृद्धि की आशा में प्रयत्नशील रहते हैं और समृद्धिशाली, ऐश्वर्यवान उसे स्थिर रखने के प्रयत्न में, इस परिवर्तन से कितना धैर्य तथा संतोष मिलता है।
यदि ऐश्वर्यशाली सदा अपनी स्थिति में रहे और दीन-दु:खी अपनी स्थिति में, तो विश्व में पाप ही अधिक हों। चाहे जितने अन्याय-अत्याचार किये जाएँ, हमारी वैभव अमर है, यह विचार धनियों द्वारा पाप की सृष्टि कराएँ । सदा यही आँसू हैं, यही वेदना है, यही पीड़ा है तो उचित-अनुचित किसी प्रकार भी जीवन व्यतीत किया जाए, अथवा प्रयत्न भी क्यों किया जाए, अब यह सब टलने वाला नहीं, यह विचार दुखियों को पाप की ओर अथवा शिथिलता की ओर प्रेरित करे ? इससे विश्व की उन्नति या विकास नहीं होता, एकरस रहने से तो मानव का मानसिक विकास नहीं होता, उसका विकास तो भिन्न-भिन्न परिस्थितियों की घाटी से पार होने में ही होता है।
इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि ‘सबै दिन जात न एक समान’। भारत का वैभव-सूर्य कभी विश्व-गगन में पूर्ण तेज़ से तप रहा था। इसकी वीरता, विद्या और कला सबका सिक्का विश्व पर जमा था। इसकी वीरता तथा युद्ध कला का आतंक यूनानियों के हृदय को दहला देता था; पर आज यह सब क्या हुआ?
एक समय जापान विश्व की दृष्टि में पिछड़ा हुआ राष्ट्र था। आज वह समान शक्ति वाला है। एक समय था जब जर्मनी को कोई जानता भी न था। प्रिंस बिस्मार्क ने उसको एक राष्ट्र बनाया और सन् 1914 ई० में उसने विश्व के समान राष्ट्रों के विरुद्ध लोहा उठाया। उसको कुचला गया, पर आज फिर वही जर्मनी विश्व का मानचित्र बदलने वाला बना हुआ है। रूस में एक समय था, जब जार शाही के अत्याचारों से प्रजा ‘त्राहि-त्राहि कर रही थी। युग-युग के पीडित मानव आज वहाँ के शासक हैं। भूतकाल का रूप निर्धनों का नर्क था, आज का रूस निर्धनों का स्वर्ग है।
किसी विशेष व्यक्ति का नहीं, किसी देश का नहीं, समस्त विश्व का प्रत्येक व्यक्ति का, हरेक जाति का, हरेक देश और राष्ट्र का इतिहास इस अमर सिद्धान्त की पुष्टि कर रहा है, सबै दिन जात न एक समान।
इस प्रकार इस वाक्य की अमरता और अचलता, परम सत्यता और अनिवार्यता को दृष्टि में रखते हुए मानव-मन निराश क्यों हों? धुंधली आँखें और अँधी क्यों हो जाएँ? पतित प्राणी शिथिल-प्रयत्न और उद्योगहीन क्यों हो जाएँ। जब यह दिन जाने ही हैं, अवश्य जाने हैं, तो जीवन का मूल्य क्यों न आँका जाए। क्यों न सबल प्रयत्नों, संचेष्ट उद्योगों और समस्त शक्तियों से अपनी प्रतिकूल परिस्थिति और विधाता के विपरीत विधान का वक्षस्थल तान कर सामना किया जाए।
आशावाद : अश्रु-गीली पुतलियों, न घबराओ, कभी तुम्हारी भी सफलता की स्वर्ण-मुस्कान की मोहक आभा क्रीड़ा करेगी। धुंधली आँखों, निराश न होना, शीघ्र ही तुम्हारे अन्दर एक प्रकाश की चमक फूट पड़ेगी और तुम भी कितनों के लिए मार्गदर्शक बनोगी। उच्छ्वासित सूखे अधरों, वह समय दूर नहीं, जब तुम्हारे कानों में सफलता और आनन्द के नशीले गाने फूट पड़ेंगे। दीन-दुखियों, अभाव-पीड़ितों, परिस्थिति के सताए मानवों, आशा न छोडो। कभी फिर तम्हारे लिए सोने के दिन और चाँदी की रातें आयेंगी; क्योंकि ‘सबै दिन जात न एक समान।’
परिश्रम दिन बदल सकता है : व्यक्ति और राष्ट्र दोनों के संदर्भ में हम एक सच्चाई पाते हैं कि परिश्रम से बुरे दिनों को भी अच्छे दिनों में परिवर्तित किया जा सकता है। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम आशा की भावना का त्याग न करें। ठोकर खाकर सिर्फ गिर न जायें -‘नहुष’ में मैथिलीशरण गुप्त का नहुष कहता है-

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