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Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

मदर टेरेसा

स्तावना : प्रेम मानव की ऐसी सर्वोत्तम भावना है जो मानव को सच्चा मानव बनाती है। मानवता के प्रति प्रेम को किसी देश, जाति या धर्म की संकुचित परिधि में नहीं बाँधा जा सकता। जिस व्यक्ति के मन में ममता, करुणा की भावना हो, वह अपना समस्त जीवन मानव की सेवा करने में अर्पित कर देता है। विश्व में मानव की नि:स्वार्थ भाव से सेवा करने वाली अनेक विभूतियों में से मदर टेरेसा सर्वोच्च थीं। उन्हें ममता, प्रेम, करुणा और सेवा की प्रतिमूर्ति कहा जाए, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं है।
जन्म : मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 को यूगोस्लाविया के स्कोपजे नामक एक छोटे से नगर में हुआ था। इनके पिता का नाम अल्बेनियन था जो एक बिल्डर थे। इनके बचपन का नाम एग्नेस बोहाझिउ था। इनके माता-पिता धार्मिक विचारों के थे। बारह वर्ष की आयु में ही इन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य तय कर लिया था।
नन बनना : 18 वर्ष की अवस्था में इन्होंने नन बनने का निर्णय कर लिया। इसके लिए ये आयरलैंड के लोरेटो ननों के केन्द्र में सम्मिलित हो गई। वहाँ से इन्हें भारत जाने का संदेश मिला।
मदर टेरेसा भारत में : 1929 ई० में एग्नेस लोरेटो एटेली स्कूल में अध्यापिका बनने कलकत्ता पहुँचीं। आरम्भ में अध्यापिका के रूप में सेवा कार्य किया। अपनी योग्यता, कार्यनिष्ठा तथा सेवाभाव के कारण प्रधानाध्यापिका बन गईं; परन्तु इनके मन को संतोष न मिला। पीड़ित मानवता की पुकार इन्हें जैसे बुला रही थी। 10 दिसम्बर 1946 को रेल से ये दार्जिलिंग जा रही थीं, तो इन्हें भीतर से पुकार पर पुकार सुनाई पड़ रही थी। इन्हें लगा कि स्कूल छोड़कर गरीबों के बीच रहकर उनकी सेवा करनी होगी। इन्होंने स्कूल छोड़ दिया। सन् 1950 में इन्होंने मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना की। ये दो पतली नीली किनारी वाली सफेद साडियाँ ले कर पीड़ित मानवता की सेवा के क्षेत्र में निकल पड़ीं।
इससे पूर्व सन् 1948 में इन्होंने कलकत्ता में झुग्गी-झोंपड़ी में रहने वाले बच्चों के लिए स्कूल खोला। फिर काली मन्दिर के पास ‘निर्मल हृदय’ नामक धर्मशाला की स्थापना की, जहाँ असहाय लोगों को आश्रय मिला। ये अपनी सहयोगिनी सिस्टरों के साथ सड़क तथा गलियों में पड़े रोगियों का इलाज़ निर्मल हृदय’ में करती थीं। इन्होंने अपना नाम 16 वीं शताब्दी में संत टेरेसा के नाम से प्रसिद्ध हुई एक नन के नाम पर टेरेसा रख लिया था।
मानव सेवा : आरम्भ में ये मरणासन्न गरीबों की तलाश में शहर भर में घूमती थीं, तब इनके पास बस, डेढ़ रुपये होते थे। पहले ये क्रीकलेन में रहती थीं और बाद में सर्कुलर रोड पर रहने लगीं । अब यह इमारत मदर हाउस के नाम से दुनिया भर में जानी जाती है।
1952 में पहला ‘निर्मल हृदय’ केन्द्र स्थापित किया गया था, आज इनकी संस्था 120 देशों में काम करती है। यह संस्था 169 शिक्षण संस्थाओं 1369 उपचार केन्द्रों और 755 आश्रयगृहों का संचालन करती है।
मदर टेरेसा अत्यन्त सहनशील और असाधारण करुणामयी थीं। रोगियों, वृद्धों, भूखे, नंगे और गरीबों के प्रति इनके मन में असीम ममता थी। इन्होंने 50 सालों तक बूढों, लाचारों, बीमार और बदहाल औरतों की सेवा और साज-संभाल की। अनाथ तथा विकलांग बच्चों के जीवन में नई रोशनी पहुँचाने में युवावस्था से जीवन की अंतिम सांस तक प्रयास किया। इन्होंने अपना सारा जीवन पीड़ितों की सेवा में समर्पित कर दिया।
निधन : मदर टेरेसा हृदय रोग से पीड़ित हुई। 1989 से ‘पेसमेकर’ के सहारे इनका जीवन चल रहा था। 5 सितम्बर, 1997 में इनका स्वर्गवास हो गया।
उपसंहार : पीडित मानवता की तन-मन से सेवा करने वाली मदर टेरेसा हमारे बीच में नहीं हैं। हमें इनके दिखाए मार्ग पर चलते हुए अनाथ, असहाय, बीमारों की सेवा का व्रत लेना चाहिए। यही इनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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