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भिखारी की आत्म-कथा


भिखारी का स्वरूप : समाज में  तिरस्कृत, जीर्णकाय, थका-माँदा, फटे-पुराने वस्त्रों से शरीर छिपाए, मैं भिखारी हूँ। आज मेरे देश में भिक्षा माँगना एक अपराध बन चुका है। इस पर भी लुके-छुपे जीवन का पहिया उसी गति पर चल रहा है ; किन्तु कभी-कभी अपनी इस अवस्था पर रोना आ जाता है और तत्क्षण कोसने लग जाता हूँ प्रारब्ध को भाग्य जो न कराए थोड़ा है। विगत जीवन की स्मृति कभी-कभी शुष्क ओष्ठों पर मुस्कान ला देती है और कभी-कभी अश्रुओं को ढुलकाने के लिए विवश कर देती है। विधाता की इस विडम्बना को देखकर थोड़ा आश्चर्य ही होता है।
आज से कुछ वर्ष पूर्व मेरी ऐसी अवस्था नहीं थी। मैं भी समाज के सम्मानित व्यक्तियों में से एक था। वास्तव में समाज का अंग ही समझ लीजिये। उस समय मैं भी भिक्षावृत्ति को हेय समझता था। भिखारी को अपने द्वार पर से दुत्कार देता था। वैसा ही व्यवहार आज मेरे साथ किया जाता है।
पूर्व जीवन : आज से लगभग 70 वसन्त पूर्व मेरा जन्म एक साधारण परिवार में हुआ था। परिवार के सदस्य अधिक थे और आय कम। जीवन निर्वाह बड़ी कठिनाई से हो पाता था। शिक्षा के साधन उपलब्ध न हो सके। परिवार के अधिकांश सदस्य अशिक्षित रह गए; पर मैं किसी तरह आठवीं तक शिक्षा ग्रहण कर सका। इससे आगे शिक्षा लेना सामर्थ्य से बाहर था। परिवार का बोझ पिता और भाइयों पर रहा था। उनकी दृष्टि में शिक्षा का कोई महत्व नहीं था। वे मुझे निठल्ला और बेकार समझते थे। उसी समय प्रथम महायुद्ध छिड़ गया। मेरे मन में भी सेना में भरती होने का विचार उठा। इस विचार को मैंने कार्यान्वित कर लिया। सैनिक जीवन ने मेरे जीवन में एक विशेष परिवर्तन ला दिया। वह थी निश्चिन्तता, जिसके लिए विश्व का हर प्राणी आकुल है। जिसे पाने के लिए मानव अच्छे-बुरे कृत्यों की ओर दौड़ता है। मैंने भी जीवन की बाजी लगाकर इसे पाया था। काम अधिक था और खाने के लिए छूट। वेतन भी इतना मिल जाता था कि परिवार के सदस्यों का रोटी का सहारा हो गया था।
युद्ध की ज्वाला दिन प्रतिदिन भडकती ही गई। मैं भी अन्य साथियों के साथ पत्र-व्यवहार द्वारा सम्पर्क रखने में असमर्थ हो गया। कदाचित् कुछ अवधि उपरांत घर वालों ने मुझे मृतक समझ लिया हो। इस कारण युद्ध में सैनिक कीड़े-मकोड़े की तरह मर रहे थे। सहसा विधाता ने मेरे साथ भी ऐसा ही एक खेल खेला। शत्रु ने रात्रि में धावा बोला। मैं पहरे पर था। घमासान युद्ध हुआ। उसमें मैं बुरी तरह घायल हो गया। कुरूपता के साथ-साथ अपंग भी हो गया। कई मास मिलिट्री अस्पताल में पड़ा रहा। अन्त में लकड़ी के सहारे चलने योग्य हो गया। इस पर भी मैं भगवान् का बारम्बार धन्यवाद कर रहा था कि उसने कम-से-कम प्राण तो बचा दिए।
अपंग और कुरूप अवस्था में जब मैं घर लौटा तो परिवार वालों ने पहचानने में भी असमर्थता प्रगट की। बड़ी कठिनाई से उन्हें विश्वास दिला सका कि मैं युद्ध की भयंकर लपटों से जीवित लौट आया हूँ। विश्वास आने पर उनके चेहरे खुशी से चमक उठे।
अब भी परिवार की आर्थिक अवस्था शोचनीय थी। दो भाई अपनी गृहस्थी के बोझ को ढो रहे थे। मेरे भेजे हुए रुपये से बहन के हाथ पीले कर दिए थे और पिता को इस बड़ी अवस्था में पेट के समाधान के लिए श्रम करना पड़ रहा था। ऐसी अवस्था में मेरे लिए खाली बैठना असम्भव था। पच्चीस रुपये की पेंशन में निर्वाह कठिन था। अभी मैं विषम परिस्थितियों में उलझा हुआ ही था कि पिता जी एक दुर्घटना में अपनी जीवन लीला समाप्त कर बैठे । उनको अन्त्येष्टि के उपरांत भावजों के व्यंग्यों से तंग आकर मुझे घर छोड़ना पड़ा। उस समय मेरा जीवन पूर्णतया अंधकारमय था। मुझ अपंग के लिए रोटी एक समस्या बन गई थी। उसी के हल हेतु मुझे अपना शहर छोड़ना पड़ा।
भिक्षावृत्ति का कारण : नए शहर में पहुँचकर मुझे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इनकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी। मैं तो ऐसे काम धन्धे की खोज में था, जिससे दो जून रोटी आराम से मिल सके। बड़ी दौड़ धूप करने के बाद भी मुझे सफलता न मिली। जो कुछ थोड़ी-बहुत नकदी साथ लेकर चला था। वह सब खाने-पीने में उठ चुकी थी। अब भूखों मरने की घडी समीप आ चुकी थी। एक समय ऐसा आया कि चार दिन तक अन्न देवता के दर्शन न हो सके। खाली पेट पर पानी हानि पहुँचाने लगा। रोटी की जुगाड़ में मैं असफल हो गया और एक संध्या को निढाल अवस्था में मुझे दूसरों के समक्ष भिक्षा के लिए हाथ पसारना पड़ा। वे कितने ग्लानि से भरे हुए क्षण थे, जिन्होंने जीवित रहने के लिए मुझसे यह नराधम कर्म करो। दिया था। मैंने अपने शिक्षण काल में रहीम जी का यह दोहा पढ़ा था-”
रहिमन वे नर मर चुके जो कहुँ माँगन जाँहि ।।
उन से पहले वे मुए जिनके मुख निकसत नाँहि ।।”

इस परिस्थिति में पहुंचने पर मुझे उक्त दोहा स्मरण हो आया। कछ दिन तो मेरे ग्लानि और क्षुब्धता में बीते। कभी-कभी लोगों की दुत्कार पर क्रोध भी आ जाता था; पर धीरे-धीरे मैं अभ्यस्त हो गया। फिर तो इस भिक्षावृत्ति में जीवन सरल दीखने लगा।
उपसंहार : कुछ शिक्षित होने के कारण अल्प समय में ही भिखारियों में आदरणीय स्थान प्राप्त कर लिया है। आज मैं हर प्रकार से निश्चिन्त हूँ। रुपये पैसे की चिन्ता से मुक्त हूँ। पेट का समाधान बड़े आराम से हो जाता है; पर दु:ख होता है कभी-कभी लोगों के व्यवहार से, उनके कड़वे बोल से। इस अवस्था में मेरा सोया हुआ अहं सजग हो उठता है और जीवन बोझ-सा लगने लगता है। कभी-कभी विगत स्मृतियाँ भी हृदय को मथ जाती हैं। फिर आज तो यह वृत्ति एक अपराध बन गई है। भारतीय सरकार इसको रोकने का भरसक प्रयास कर रही है। क्या इस कार्य में उसे सफलता मिल सकेगी? यह असम्भव-सा प्रतीत होता है; क्योंकि हमारी संख्या इतनी अधिक बढ़ चुकी है कि समाज की एक इकाई भी मान लिया जाए, तो कोई अत्युक्ति न होगी। इस अपराध को रोकने के लिए कानून की आवश्यकता नहीं अपितु समाज के प्यार की आवश्यकता है।

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