Facebook

Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

जवाहरलाल नेहरू

प्रस्तावना : सारा जगत् नश्वर है। इसमें असंख्य प्राणी आए और चले गए। कोई उनके नाम से परिचित नहीं, कोई उन्हें स्मरण नहीं करता । केवल उनके सगे-सम्बन्धी आगमन पर खुश हुए और गमन पर कुछ दिन के लिए दु:खी। फिर वही क्रम चलता रहा। सब अपने कर्मों में उलझ गए और धीरे-धीरे स्मृति भी मानस पटल पर से उतरती चली गई। किन्तु ऐसी विभूतियाँ भी इस जगत् में अवतरित हुई हैं, जो. अपने यश सौरभ से इस नश्वर जगत् को आलोकित कर गई हैं। कई सदी तक जनता-जनार्दन उन्हें भूल नहीं सकती। हर वर्ष किसी न किसी रूप में उन्हें स्मरण करती रहती है। महात्मा बुद्ध, ईसामसीह, महावीर स्वामी, गुरु नानक, महात्मा गाँधी, ताशकंद शहीद शास्त्री जी और शांतिदूत जवाहरलाल नेहरू ऐसे ही महापुरुषों में से थे जो मरकर भी अमर हो गए।
जन्म और वंश परिचय : शांतिदूत जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवम्बर, 1889 ई० को इलाहाबाद के आनन्द भवन में हुआ था। आपके पिता श्री मोतीलाल नेहरू इलाहाबाद के प्रसिद्ध बैरिस्टर थे। आपकी शिक्षा हैरो में हुई। बार० ऐट-ला० की उपाधि लेकर आप । भारत लौटे । आपका विवाह अद्वितीय सुन्दरी कमला के साथ हुआ, जिनसे प्रियदर्शनी इन्दिरा गाँधी का जन्म हुआ।
आज़ादी का पुतला श्री नेहरू : विदेश से लौटते ही नेहरू ने स्वदेश की दुर्दशा को देखा। परतंत्रता खल उठी। राष्ट्रपिता गाँधी जी से प्रभावित होकर स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। वकालत को तिलांजलि दे दी। पहले तो पिता इससे रुष्ट हुए और बाद में आपकी राजनीति से प्रभावित होकर स्वयं भी स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। विश्व के इतिहास में यह एक अनोखा उदाहरण था कि एक पिता ने अपने पुत्र के पथ-प्रदर्शन पर राजसी वैभव का त्याग कर दिया था।
गाँधी जी के सत्याग्रह एवं असहयोग आन्दोलन में श्री नेहरू ने। महान् योगदान दिया। इसी समय कमला नेहरू का विदेश में स्वर्गवास हो गया। नेहरू को पत्नी की मृत्यु का बड़ा आघात पहुँचा; पर आप अपने पथ से विचलित नहीं हुए। आपको स्वाधीनता आन्दोलन में कई बार कारावास का दण्ड भुगतना पड़ा। सन् 1928 ई० में प्रथम बार आप कांग्रेस के अध्यक्ष निर्वाचित हुए और सन् 1929 ई० में आपने रावी तट पर पहले पहल घोषणा की, “हमारे इस स्वाधीनता संग्राम का उद्देश्य औपनिवेशिक स्वाधीनता नहीं अपितु पूर्ण स्वतन्त्रता है” तत्पश्चात् श्री नेहरू देश के उन अग्रणी नेताओं में हो गए जिनके पथ-प्रदर्शन पर ही स्वाधीनता संग्राम चला। उन्हीं विभूतियों के संघर्षों के फलस्वरूप 15 अगस्त 1947 ई० को भारत आजाद हुआ।
स्वतन्त्र भारत के निर्माता श्री नेहरू : भारत के स्वतन्त्र होते ही श्री नेहरू ने प्रधानमन्त्री के रूप में उसकी बागडोर सम्भाली। आर्थिक स्थिति का अवलोकन किया, सामाजिक कुरीतियों को दूर करने में संलग्न हुए और राजनीतिक उच्छृखलता को दूर करने के उपाय सोचे जाने लगे। सरदार पटेल के सहयोग से आपने देश की अनेक समस्याओं को सुलझाया। देशी रियासतें भारतीय संघ में सम्मिलित कर दी गईं। तत्पश्चात् श्री नेहरू ने भारत के आर्थिक विकास और अन्तर्राष्ट्रीय जगत् में उसकी प्रतिष्ठा बनाने का प्रयास किया। पंचवर्षीय योजनाएँ चालू की गईं । इस आदर्शवादी राजनीतिज्ञ ने विज्ञान और टेक्नालाजी की शिक्षा पर जोर दिया। आप रूढिगत परम्पराओं के सदैव से विरोधी रहे। हिन्दू कोड बिल के द्वारा आपने हिन्दुओं की बहुत-सी धार्मिक एवं सामाजिक असमानताओं को दूर करने का प्रयत्न किया; पर काश्मीर समस्या और चीनी आक्रमण ने आपको विचलित कर दिया। इन दोनों ही समस्याओं का श्री नेहरू डटकर मुकाबला करते रहे। आप न्याय के पथ से विचलित नहीं हुए। आपने भारत को अन्तर्राष्ट्रीय जगत में उच्च स्थान दिलाया। पूँजीवादी और साम्यवादी गुटों की इच्छाओं को ठुकराकर तटस्थता की नीति का ही अनुसरण किया। भारत की इस नीति से कई देश बहुत ही प्रभावित हुए। सच पूछो तो विदेशों में भारत के गौरव को बढ़ाने का श्रेय आपको जाता है।
मानवतावादी श्री नेहरू : श्री नेहरू सच्चे मानवतावादी थे। आप युद्ध को भयंकर अभिशाप समझते थे और नि:शस्त्रीकरण के पुजारी थे। कोरिया और इण्डोनेशिया में भड़की हुई युद्ध की ज्वाला को शान्त करने का श्रेय श्री नेहरू को ही जाता है। श्री नेहरू ने वांडुग सम्मेलन में मानवता एवं शांति का जो उच्चादर्श रखा, वही पीड़ित मानवता के लिए हितकर है। पंचशील के जनक श्री नेहरू के रोम-रोम में कराहती हुई मानवता के प्रति सहानुभूति थी। आपने जीवन पर्यन्त शांति के लिए प्रयास किया। आप के कदम सदैव न्यायपथ पर ही उठे। इन्हीं आदर्शो । के पीछे श्री नेहरू युग-युग तक अमर हो गये।
साहित्यकार श्री नेहरू : श्री नेहरू उच्च कोटि के राजनीतिज्ञ ही नहीं अपितु अच्छे लेखक एवं वक्ता भी थे। आपकी ‘ऑटोबायग्राफी’ (आत्म कथा) ‘गिलम्पसेज ऑफ वल्र्ड हिस्ट्री’ (विश्व इतिहास की। झलक) ‘डिस्कवरी ऑफ इण्डिया’ (भारत अन्वेषण) आदि कृतियाँ साहित्यकला के गुणों से अलंकृत हैं।
बच्चों के बीच श्री नेहरू : श्री नेहरू बहुत ही भावुक थे। नन्हे-मुन्नों से आपको बहुत प्रेम था। वे आपको चाचा नेहरू कहकर पुकारते थे और हर वर्ष आपका जन्म दिवस बाल दिवस’ के रूप में आज भी मनाया जाता है। चाचा नेहरू के दीर्घायु होने की कामना की जाती थी। अब इस दिन इस दिवंगत महान् आत्मा से प्रेरणा ली जाती है।
अन्तिम दर्शन : स्वाधीन भारत की बागडोर श्री नेहरू केवल 17 वर्ष तक ही सम्भाल सके। अपने जीवन का 75 वाँ बसन्त देखते-देखते अकस्मात् 27 मई, 1964 को यह महान् विचारक, साहित्यकार और शांतिदूत हमारे बीच से उठ गया। आपके निधन पर भारत ही नहीं अपितु समूचा विश्व रो उठा। देश-विदेशों से विशेष प्रतिनिधि अपने प्रिय नेता के अंतिम दर्शन करने के लिए भारत पधारे। 28 मई 1964 ई० को शांति वन में जब आपकी पार्थिव देह को चंदन की चिता पर रखकर अग्नि प्रज्ज्वलित की गई, तो आपका रोम-रोम भस्म होकर भी कह रहा था-शांति-शांति। आपकी वसीयत के अनुसार आपकी भस्म खेतों और गंगा नदी में प्रवाहित की गई।
उपसंहार : हमारा प्रिय नेता, राष्ट्र का सच्चा नायक और विश्व को शांति का पाठ पढ़ाने वाले श्री नेहरू हमारे बीच नहीं रहे ; पर आप अपने क्रिया-कलापों, रहन-सहन और आचार-विचार के द्वारा जो छाप छोड़ गए, वह अमिट है। भलाई और ईमानदारी का जो बीज आपने हमारे बीच बोया है, वह पल्लवित होता रहेगा। आप भारत को उन्नत देखना चाहते थे। आप पीडित मानवता को सुखी देखना चाहते थे। हम आपकी कामनाओं को पूर्ण करने के लिए सदैव तत्पर रहेंगे।

Post a Comment

0 Comments