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Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

मेरा प्रिय कवि

प्रस्तावना : यह वह समय था जब कि साहित्य परिस्थितियों के हाथ की कठपुतली बना हुआ था। निर्गुणोपासक संतों की वाणी निष्प्रभावी हो चुकी थी । सब जगह एक कमी का अनुभव किया जा रहा था। इस कमी की पूर्ति तुलसीदास ने की । इनका स्थान विश्व के साहित्य मंच पर अद्वितीय है। इसी कारण मैं भी इन्हें अपना प्रिय कवि मानता हूँ।
जन्म और वंश परिचय : मेरे प्रिय कवि तुलसी को विश्व के सभी नर और नारी जानते हैं; किन्तु वे कब पैदा हुए इस बात को कोई भी निश्चित रूप से नहीं जानता है। ‘शिवसिंह सरोज’ में इनका जन्म सम्वत् 1583 बताया गया है और ‘गोसाईं चरित्र’ में यह सम्वत् 1554 अंकित है। विदेशी विद्वान् ग्रियर्सन सम्वत् 1586 को इनकी जन्म तिथि बताते हैं। डॉ० माताप्रसाद गुप्त, रामनरेश त्रिपाठी और पं० रामगुलाम दूबे इसी तिथि के समर्थक हैं; किन्तु अधिक उचित सम्वत् 1554 ही माना जाता है; क्योंकि यह परम्परा में आ गया है। इसी प्रकार का विवाद इनके जन्म स्थान के विषय में भी रहा है। किसी के मतानुसार इसका जन्मस्थान ‘राजापुर’ और किसी के अनुसार ‘सोरो’ माना गया है। किन्तु डॉ० भागीरथ ने अपने ‘तुलसी रसायन’ ‘सूकर खेत’ नामक स्थान के पास तुलसी की जन्मभूमि हो सकती है, ऐसा संकेत किया है। यह सम्भव हो सकता है कि उनका कथन ठीक हो।
तुलसीदास ने अपने अनेक ग्रंथों में अपना परिचय दिया है। इनके परिचित लोगों ने बहुत-सी बातें कही हैं। उन्हीं बातों के आधार पर इनके पिता जी का नाम आत्माराम दूबे और माता जी का नाम हुलसी बताया जाता है। यह ‘दोहा इस विषय में विचार करने योग्य है –
सुरतिय, नरतिय, नागतिय, चाहत अस सब कोय।
गोद लिए हुलसी फिरै, तुलसी सो सुत होय।।
प्राय : देखा गया है कि सभी संत और महात्मा जाति-पाँत से दूर रहते हैं। तुलसीदास भी इन्हीं में से हैं। ‘तुलसी चरित्र’ और ‘गोसाईं चरित्र’ में इन्हें सरयूपारी ब्राह्मण बताया गया है; किन्तु ‘भक्त कल्पद्रुम’ में ये ‘कान्यकुब्ज’ घोषित किए गए हैं तथा मिश्र बंधु भी इसी को मानते हैं। अन्तर्साक्ष्य के आधार पर तुलसीदास का बचपन बड़े ही कष्ट में बीता है। ऐसा हो सकता है कि इनका जन्म मूल नक्षत्र में हुआ हो । इस कारण इनके माता-पिता ने इन्हें छोड़ दिया हो। इनके जन्म के कुछ दिनों के बाद ही माता-पिता स्वर्ग सिधार गए। इसके बाद सम्भवत : ये घर से भी निकाल दिये गए हों। वास्तव में इन्हें अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। पेट भरने के लिए भीख भी माँगनी पड़ी। संतों की शरण में जाने से पूर्व इन पर दीनता का साम्राज्य था। ‘विनयपत्रिका’ और ‘कवितावली’ में वर्णित दीनता का चित्रण इनकी गरीबी का यथेष्ट प्रमाण है।
शिक्षा, विवाह और मानस की रचना : तुलसीदास के गुरु थे। बाबा नरहरिदास। इनकी शरण में पहुँचने पर ही इनकी दीनता का उद्धार हुआ था। इन्हीं के द्वारा शिक्षा-दीक्षा मिल पायी थी। महात्मा शेष सनातन ने इन्हें वेद, वेदांग दर्शन, इतिहास और पुराण आदि में चतुर बना दिया। अध्ययन समाप्ति पर ये अपने जन्म स्थान पर आए और यहाँ पर इनका विवाह रत्नावली नामक सुन्दर युवती से हो गया। अब ये उस सुन्दरी के रूप लावण्य में ही लीन रहने लग गए। पत्नी की ओर से इस रूपासक्ति पर करारी फटकार मिली जिससे वैराग्य उत्पन्न हो गया और ये काशी चले आए। कुछ दिनों बाद ये अयोध्या गए और वहीं पर संवत् 1631 ई० में ‘रामचरितमानस’ का श्रीगणेश हुआ। यह महाकाव्य 2 वर्ष 7 मास में पूर्ण हुआ। इसका कुछ अंश इन्होंने काशी में ही बनाया। इसके बाद ये काशी में ही रहे।
निधन : तुलसीदास को वृद्धावस्था में बाहु पीड़ा का कष्ट हो गया था; किन्तु जीवन का अंत शांतिपूर्ण ही हुआ। इनका निधन संवत् 1680 में श्रावण मास के पक्ष की तृतीया को शनिवार के दिन हुआ था। कुछ विद्वान् इसके स्थान पर ‘श्रावण शुक्ला सप्तमी’ को उनकी मृत्यु का होना मानते हैं; परन्तु यह गलत है। पहली तिथि गणनानुसार ठीक बैठती है। बनारस के जमींदार टोडरमल के वंशज तुलसीदास के नाम का सीधा आदि इसी दिन देते हैं। अत : यही तिथि मान्य है।
कृतियाँ : इनके बारह ग्रन्थ प्रामाणिक माने जाते हैं। रामचरितमानस, विनयपत्रिका, गीतावली, कवितावली, दोहावली, रामललानहछु, पार्वतीमंगल, जानकीमंगल बरवैरामायण, वैराग्यसंदीपनी, कृष्ण गीतावली और रामाज्ञा प्रश्नावली आदि ग्रंथ ही इनके द्वारा रचे गए हैं।
दार्शनिक विचार : ये किसी वाद विशेष के चक्कर में नहीं आए। इनका दृष्टिकोण समन्वयवादी था। शैव, शाक्त और पुष्टिमार्गी इनके समय में प्रधान रूप से अपने मत का प्रचार भी कर रहे थे। इन्होंने इनका विरोध नहीं किया अपितु अपने ही मत के भीतर इन्हें सम्मिलित कर लिया; इन्होंने वैष्णव धर्म को इतना व्यापक रूप दिया, जिसके अन्दर शैव, शक्त और पुष्टिमार्गी- सरलता से समाविष्ट हो गए। इन्होंने शैवों और वैष्णवों के विरोध को ‘रामचरितमानस’ में दूर करने का प्रयास किया।
इसके अलावा एक समस्या इनके सामने सगुण निर्गुण उपासना और अद्वैत तथा विशिष्टाद्वैत की थी । इन्होंने इसका समाधान बड़े उत्तम ढंग से किया। अद्वैतवाद के अनुसार ब्रह्म के अतिरिक्त जो कुछ भी दिखाई देता है, वह वैत भावना के रूप में दृष्टिगत है, वह भ्रम माया के कारण है। अतः मैं ब्रह्म ही हूँ। विशिष्टाद्वैतवाद के अनुसार जीव ब्रह्म नहीं। है, वह ईश्वर का अंश है। तुलसीदास ने दोनों का समन्वय किया। वास्तव में ये सैद्धान्तिक रूप से तो अद्वैतवाद को मानते हैं, पर व्यावहारिक रूप में ये विशिष्टाद्वैतवाद के ही समर्थनकर्ता हैं। इनके अनुसार ईश्वर और जीव में भेद है। जीव परवश है और ईश्वर स्ववश है।
परवस जीव स्ववस भगवंता।
जीव अनेक एक श्री कंता।।”
जब ब्रह्म और जीव में सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, तो प्रश्न उठता है कि वह ब्रह्म सगुण है अथवा निर्गुण है। तुलसीदास यहाँ भी समन्वयवादी हैं। ये उसे दोनों रूपों में देखते हैं। अत : इनके मतानुसार राम निर्गुण होते हुए भी अवतार लेते हैं।
काव्य-भाषा : इन्होंने ब्रज और अवधी भाषाओं को अपनाया है। ‘रामचरितमानस’ इनकी सर्वश्रेष्ठ कृति है जो अवधी भाषा में लिखी गई है। यह इनकी कीर्ति का स्तम्भ है। इसकी लोकप्रियता इस बात से प्रकट होती है कि इसका अनुवाद विभिन्न भाषाओं में विभिन्न देशों के अन्दर हुआ है। ‘कवितावली’, ‘गीतावली’, ‘विनयपत्रिका’ और ‘कृष्णगीतावली’ आदि ग्रंथों की रचना ब्रजभाषा में हुई। सच बात तो यह है कि इन्होंने भावानुकूल ही भाषा का प्रयोग किया है। इन्होंने युद्ध वर्णन में कठोर शब्दावली व शृंगार या शांत रस का प्रदर्शन करने में कोमलकान्त पदावली का प्रयोग किया है। इनकी भाषा मुहावरे तथा लोकोक्तियों से युक्त है। इसमें संस्कृत, अरबी, फारसी, पंजाबी, बंगला, राजस्थानी और गुजराती आदि भाषाओं के शब्दों का भी समावेश है। इनका शब्द ज्ञान इतना बढ़ा हुआ था कि कदाचित् ही किसी हिन्दी कवि का हो।
काव्य के गुण : तुलसीदास ने अपने ग्रंथों में ओज, प्रसाद और माधुर्य तीनों गुणों का भी अच्छा निर्वाह किया है। काव्य में, अलंकार और रस : इन्होंने अधिकांशतः उपमा, उत्पेक्षा अनुप्राय और रूपक आदि अलंकारों का प्रयोग स्थान-स्थान पर किया है। इनके प्रबंध और मुक्तक काव्यों में सभी रसों का निर्वाह भली भाँति हुआ है।
काव्य शैली : इन्होंने अपने समय की प्रचलित छप्पय, कवित्त, दोहा, चौपाई और पदशैली को अपनाया। इन्होंने प्रबन्ध, मुक्तक और गीति सभी तरह के काव्यरूपों का प्रयोग किया है। नि:स्संदेह तुलसीदास हिन्दी के सर्वश्रेष्ठ कवि हैं।

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