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Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

शठ सुधरहिं सत्संगति पाई

प्रस्तावना : यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक अरस्तु के अनुसार कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। अत: वह अकेले रहना नहीं चाहता है, उसे साथ चाहिए, वह संगति की अपेक्षा करता है। मानव को संगति चयन में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। बड़ा सोच-विचार कर साथियों का चयन बच्चे को बचपन ही से कराना चाहिए; क्योंकि एक बार जो संस्कार पड़ जाते हैं, वे फिर आसानी से समाप्त नहीं होते हैं। यही कारण है कि संगति के विषय में प्राचीन और अर्वाचीन सभी विचारकों ने बड़ी गम्भीरता के साथ चिन्तन किया तथा संगति की महिमा का वर्णन किया है। कविकुल चूड़ामणि गोस्वामी तुलसीदास जी ने सत्संगति का वर्णन बड़ा विस्तारपूर्वक किया है। एक स्थान पर वह कह उठे-
तात स्वर्ग अपवर्ग सुख, धरिय तुला इक अंग।
तूल न ताहि सकल मिलि, जो सुख लव सत्संग।।”
कवि की इस युक्ति में वास्तविकता है।
जो स्वर्ग इतना महान् है कि स्वर्ग तथा मोक्ष आदि का सुख भी उसकी समानता नहीं कर सकता, आखिर वह सत्संग है क्या ?
सत्संग का अर्थ : ‘सत्संग’ शब्द सत् + संग से बना है। सत् का अर्थ सज्जन एवं संग का अर्थ है साथ। अतः सज्जन लोगों की संगति सत्संगति या सत्संग कहलाता है। शिष्ट, सहृदय एवं परोपकार आदि से युक्त जो सज्जन होते हैं, उन्हीं का साथ करना चाहिए। विस्तृत अर्थों में केवल साथ रहने मात्र ही का नाम सत्संग नहीं हो सकता। यदि संगति से लाभ नहीं हुआ, तो वह वैसे ही है जैसे चित्र में बने। प्रेम-रहित होने पर लोगों की आकृतियाँ चित्रवत् हैं और उनकी बातें अर्थ रहित हैं। अत: यह सिद्ध हुआ कि संगति के लिए प्रेम का होना परमावश्यक है। यदि मनुष्य सच्चे अर्थ में संगति की कामना करना चाहता है, तो उसे प्रेमभाव को अपनाना होगा।
सज्जनों के सद्गुण : जहाँ दुर्जन अवगुणों की खान एवं नर्क दर्शन कराने वाले होते हैं, वहीं सज्जन सद्गुणों का भण्डार होते हैं तथा वे स्वर्ग के दर्शन इंसी भू पर करते हैं। सज्जन अपने हानि या लाभ की चिन्ता न करके दूसरों का हित साधन करते हैं। सज्जनों का धन व विद्या परोपकारार्थ होती है। ऐसे ही सज्जनों के लिए तुलसी ने कहा-
परहित लागि तजहिं जो देही। सन्तन संत प्रशंसहिं तेही।।”
सज्जन दूसरों को सुखी देखकर मुदित (प्रसन्नता की भावना से युक्त) तथा दूसरों को दु:खी देखकर करुणा से युक्त होते हैं तथा ऐसे सन्त, “पर दु:खे उपकार बहुत जे मन अभिमान न आने रे।” दुष्ट व्यक्ति स्वयं अपनी प्रशंसा अपने मुख से करता है; किन्तु सज्जन अपने मुख पर अपनी प्रशंसा दूसरों से सुनने के अभ्यस्त नहीं होते हैं तथा मन में। स्वाभिमान होते हुए भी अभिमान नहीं करते तथा सर्वदा दूसरों के सम्मुख अपने छोटा एवं अज्ञानी ही बतलाते हैं।
सत्संगति का महत्त्व : ‘संसर्गजा दोष गुणा भवन्ति’ के कथनानुसार संगति के प्रभाव से ही दोष व गुण उत्पन्न होते हैं। दुष्टों की संगति करने से दुर्गुण आते हैं और सज्जनों के सम्पर्क से हम महान् बन जाते तथा हमारा महत्व बढ़ जाता है, जैसा कि इन्हीं भावों को इस कथन में व्यक्त किया  गया है।
संगति ही गुण ऊपजै, संगति ही गुण जाय।
बाँस फाँस औ भीतरी, एकै भाव निकाय।”
एक छोटा-सा पैरों तले कुचला जाने वाला कीट भी पुष्प की संगति से महान् पुरुषों तथा देवों के सिर पर वास पाता है। काँच का टुकड़ा सोने के आभूषण में मरकत मणि जैसी द्युति को धारण करता है। इसी प्रकार कमल के पत्तों के ऊपर पड़ा जल मोती के समान शोभायमान होता है। पवन के संग से धूल आकाश पर चढ़ जाती है और वही नीच जल के सम्पर्क से कीचड़ में मिल जाती है। सत्संग से व्यक्ति कुछ का कुछ बन जाता है। इस विषय में किसी भी व्यक्ति को आश्चर्य नहीं करना चाहिए; क्योंकि सत्संगति का महत्त्व सर्वविदित है जैसा कि महात्मा तुलसीदास ने अपना मत अभिव्यक्त किया है-
सुनि अचरज करै जनि कोई। सत्संगति महिमा नहिं गाई।।”
सत्संग में रहने से मानव को उसकी हीन वृत्तियाँ नहीं सता पाती। हैं। विश्वविख्यात, साहित्य-सृष्टा व मानवतावादी लेखक टालस्टाय ने एक स्थान पर लिखा है कि जंगली जानवरों का रक्त सदा ही मानव में रहता है। लेखक का कथन सत्य है और इस जंगली रक्त के प्रभाव को बचाना सत्संगति का ही काम है। इस कारण भी सत्संग को बड़ा महत्त्व दिया गया है।
सत्संगति के उदाहरण : सत्संग के प्रभाव से दुष्प्रवृतियों वाले बड़े-बड़े दानव भी देवता बन जाते हैं। कौन नहीं जानता कि कुख्यात व दुर्दान्त डाकू अंगुलिमाल महात्मा बुद्ध की संगति से ही सहृदय तथा महान् मानव बन गया था। वह वंही डाकू था जिसे पकड़ने में सरकार की सम्पूर्ण सेना भी मात खा चुकी थी। महान् आदिकवि वाल्मीकि के नाम से कौन अनभिज्ञ है। यही वाल्मीकि प्रा में कुख्यात तथा दुर्दांत लुटेरे थे। सज्जन मुनियों के उपदेश से उनको वैराग्य हुआ और घर बार छोड़ कर उन्होंने राम के उल्टे नाम ‘मरा- परा’ का जाप किया। जिससे वे कवि के शब्दों में-

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