Facebook

Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

मन के हारे हार है मन के जीते जीत

मन की महत्ता : दो वर्षों से निर्मित यह छोटा-सा शब्द ‘मन’ सष्टि की सल विचित्र वस्तु है। जितना यह आकार में छोटा है उतना ही इसका हृदय विशाल है। जिस प्रकार छोटे से बीज में विशाल वट का वृक्ष छिपा होता है उसी प्रकार इसमें सारा त्रिभुवन समाया हुआ है। कहने का तात्पर्य यह है कि छोटे से छोटा और विशाल से विशाल कार्य बिना मन की एकाग्रता के नहीं हो सकता है।
मानव मननशील प्राणी है। इसकी मनन की प्रक्रिया मन से ही सम्भव है। मने मानव की संकल्प-विकल्प शक्ति है और मनन मेन का धर्म है। इसी के द्वारा मानव, मानव है। इसकी गति पवन से भी तीव्र है। सच मानो तो यह स्वयं ही ब्रह्माण्ड है। जो कुछ बाह्य रूप में घटित होता है, वह इसमें घटित होता है। यह सृष्टि की वह शक्ति है जिसकी समानता अन्य किसी पदार्थ से नहीं हो सकती है।
मन सब बातों का स्रोत : मन वह स्रोत है जिसमें विचार रूपी जलधाराएँ अनायास ही सम्भूत होती हैं। विचारों का प्रवाह लगातार बहता रहता है। इस अगाध प्रवाह को रोकने की क्षमता किसी में नहीं है। इसी प्रवाह के वशीभूत होकर मानव कर्म करता है और उसी के अनुसार वह फल भोगता है। तुलसी के इन शब्दों को देखिये –
कर्म प्रधान विश्व करि राखी ।।
जो जस करहि सो तस फल चाखा ।।”
कर्म में विचार के बाद प्रवृत्ति का आगमन होता है। अतः इच्छानुसार ही मानव की फलसिद्धि का अधिकार उपयुक्त है। विचार से कर्म, कर्म से स्वभाव और स्वभाव द्वारा चरित्र बल बनता है। मनन व्यक्ति के चरित्र निर्माण में सहयोगी है।
मन जीते जगं जीत : गुरु नानक देव जी के इस कथन में कितनी सार्थकता है ? विश्व को जीतने के लिए मन की जीत आवश्यक है। इसके पराजित होने पर मानव की पराजय निश्चित है। महाभारत के युद्ध में पार्थ को शिथिल देखकर योगीराज कृष्ण ने कर्मण्यता का उपदेश देकर उसे उत्साहित किया था।
“हे पार्थ ! तू कायरता को मत प्राप्त हो, यह तेरे योग्य नहीं। हे परंतप ! तुच्छ हृदय की दुर्बलता का त्याग कर तू उठ खड़ा हो।’
मन की विजय का एकमात्र शस्त्र है संकल्प। मन में मनन की चिन्तामणि और शक्ति पर साहस की कौस्तुभ मणि के विराजने से मानवी शक्ति इतनी प्रबल हो जाती है कि ब्रह्माण्ड की कोई भी वस्तु उनकी उपलब्धि सीमा से बाहर नहीं रह सकती है। इसके विपरीत विचलित विचारों वाला इन्सान सभी ओर से हताश और निराश रहता है। उधेड़बुन से साफल्य की आशा करना कोरी मुर्खता है।
स्वस्थ मन : स्वस्थ मन के द्वारा ही देह में शक्ति एवं स्फूर्ति का संचार होता है। यदि मन अस्वस्थ है तो देह अवश्य निष्क्रिय हो जायेगी। यह विश्व शक्तिवान का है और निर्बल का इस विश्व में कहीं भी ठिकाना नहीं है। उसका मरण मृत्यु से पूर्व ही सहस्रों बार हो जाता है और डरपोकपन का सम्बन्ध मन से होता है। डरपोकपन का दूसरा नाम ही मन की हार है। फलस्वरूप मन की हार बहुत ही भयंकर है। निडरता, अध्यवसाय, शौर्य और विषय-प्रवृत्ति मन की हार से दूर भाग जाते हैं। जो मन से पराजित हो जाते हैं, उनका मन चिन्ता रूपी अग्नि में जुलता रहता है और इस प्रकार जीवित इन्सान ही मरे हुए के समान हो जाता है।
पवित्र-अपवित्र, छोटे और बड़े, अच्छे और बुरे सभी प्रकार के विचार मन रूपी गगन में उदय होते हैं, इसी विचार-भेद से मनुष्य-मनुष्य में अन्तर आ जाता है। कोई महाशय है तो कोई क्षुद्राशय, कोई डरपोक है तो कोई हिम्मती, कोई दयालु है तो कोई निष्ठुर है, तो कोई स्वार्थी। सच तो यह है कि सुन्दर मन की ही सब जगह पूछ है।
मन की शक्ति प्रबल : सबल मानव स्वयं भाग्य का निर्माता है; परन्तु निर्बल मानव सदैव भगवान् की रट लगाये रहता है। सबल को अपनी मानसिक शक्ति पर गर्व होता है, उसकी भुजाओं में कार्य करने की क्षमता होती है, वह विधाता के हाथ का खिलौना बनना नहीं चाहता और कठपतली के समान किसी के इंगित पर नाचना नहीं चाहता। मानव इस विश्व में जितने भी कार्य करता है, उनकी सफलता अथवा असफलता मन पर आधारित है, उसे भाग्य के सिर पर मढ़ देना मूर्खों का काम है। भावों की शक्ति ही सफलता-असफलता का निर्धारण किया करती है। यदि मन रूपी बटोही ही थका हुआ है, तो गन्तव्य स्थान पर पहुँचना ही मुश्किल है। यदि मन ही किसी काम में नहीं लगता है, तो फल की आशा करना गूलर के फलों से रस निकालने के समान है। इसके विपरीत यदि अदम्य उत्साह एवं लगन से कार्य किया जाये, तो कार्य क्षमता में बढ़ोतरी होती है। अत: हमारा अध्यवसाय और पुरुषार्थ हो भाग्य है। इसकी निर्मात्री है सबल मानसिक शक्ति।
तभी तो निर्गुणपंथी कबीर दास ने मन विचलित होने से रोकते हुये कहा है।
डगमग छोड़ दे मन बौरा ।।
अब तो जरै बरै बनि आये लीने हाथ सिन्धौरा ।”
वास्तव में मानव मन ही सर्वश्रेष्ठ तीर्थ है, इसी की यात्रा करने से मानव जीवन सफल हो सकता है।
लौकिक सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद और हार-जीत सभी मन की कल्पना हैं। मन कल्पवृक्ष है जिस पर द्वन्द्वात्मक विश्व रूपी फल लगते हैं। वह अच्छे विचारों के द्वारा सुख, हर्ष और जीत आदि पाया है और बुरे विचारों के द्वारा, दु:ख, विषाद और हार उसके हाथ लगती है। यदि मन में दृढ़ संकल्प की शक्ति विद्यमान है, तो अवश्य उसकी जीत होगी; अन्यथा वह पाप के ज्वर से पीड़ित रहेगा।
स्वस्थ मन उस दर्पण के समान है जिसमें हर्ष और विजय का ही प्रतिबिम्ब स्पष्ट रूप से दृष्टिगत होता है। ऐसा ही मन मनुष्य का सच्चा साथी है। इसके विपरीत यदि मन कभी किन्हीं चक्करों के कारण अपने मार्ग से भटक जाता है, तो वह मनुष्य के प्रबल शत्रु के समान हो जाता है। एक कवि के शब्दों से पुष्टि हो जाती है।

Post a Comment

0 Comments