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Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

धीरज धर्म मित्र अरु नारी


आपत्ति काल की अवस्था : आपत्ति काल वह अग्नि युग है, जिसमें सुख-शांति जल कर भस्म हो जाती है, आँखों से नींद काफूर हो जाती है, चित्त में अस्थिरता का साम्राज्य छा जाता है, सुगम से सुगम कार्य दुष्कर प्रतीत होने लगता है, अच्छा, बुरा दीखने लगता है, पाप वृत्ति की ओर हृदय भागने लगता है और बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। कोई मार्ग नहीं सूझता, कहाँ जाये, क्या करे किसकी शरण से इस काल परिचायक-आपत्ति को काटे, कोई ठौर नहीं, कोई आत्मीय नहीं; किन्तु जहाँ यह इतनी दु:खदायी है, वहाँ यह अपने-पराये की पहचान भी करा देती है। अत: यह परीक्षा काल है। इसमें धैर्य, धर्म, मित्र, सेवक और नारी की परीक्षा होती है। सुख-सम्पन्नता में हर इन्सान साथी है, सम्बन्धी है, सेवक भी स्वामित्व धर्म का खूब पालन करता है और पत्नी सहधर्मिणी रहती है; परन्तु आपद्-काल में सच्चा मित्र और पतिव्रता स्त्री ही साथ देती है; किन्तु स्वार्थी और कुलटा स्त्री एकदम साथ छोड़ जाते हैं।
धैर्य का महत्त्व : राष्ट्रपिता गाँधी ने अपनी जीवनी में इस घटना का उल्लेख किया है कि जब वे विलायत जा रहे थे, एक भयंकर तूफान आया। सभी लोग रोने-पीटने लगे। वे पूर्ववत् रहे। उन्हें देखकर अन्य आश्चर्यचकित रह गये। जो अपने बल की डींग हाँकते थे, वे रोतेचिल्लाते दिखाई दिये। तूफान की भयंकरता से उत्पन्न आपद् में गाँधी जी ने अपने धैर्य को दिखा दिया, नहीं तो जलयान में उपस्थित सभी लोग एक से एक तीसमारखाँ थे। कानपुर के साम्प्रदायिक दंगे में श्री गणेशशंकर विद्यार्थी ने अपने जीवन की बलि चढ़ाकर धैर्य का परिचय दिया और टामस मोर ने धर्म के नाम पर सूली का आलिंगन किया। फाँसी लगने से कुछ क्षण पूर्व उसने जल्लाद से परिहासात्मक स्वर में कहा, “क्यों भाई, मुझे अपनी दाड़ी तो बना लेने दो ।’ तत्पश्चात् हँसते हुए उसने मौत का आवाहन स्वीकार किया। यह है धैर्य। वास्तव में मुसीबत का सामना न हो, तो प्राणीमात्र स्वयं को ही न पहचान सके।
धर्म की कसौटी : धर्म की कसौटी ही आपत्ति है। सत्यवादी हरिश्चन्द्र ने सत्य धर्म की रक्षार्थ अपना सर्वस्व ही नहीं खोया; अपितु बच्चे और पत्नी को बेचकर स्वयं डोम की सेवा की। अन्त में उनकी विजय हुई और विश्व में सदैव के लिये नाम अमर कर लिया। धर्म प्रचार हेतु शांतिदूत ईसामसीह ने शुली को प्यार किया। गुरु गोविन्द सिंह के दोनों पुत्रों ने धर्म की रक्षा के लिये दीवार में चिना जाना स्वीकार किया और धर्मवीर हकीकतराय धर्म बलिवेदी पर कुर्बान हुए। राजपूती इतिहास भी इसका साक्षी है कि राजपूतनियों ने जौहर धर्म का पालन किया और मलेच्छों के स्वप्नों को साकार न होने दिया। इनमें महारानी पद्मिनी का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। परीक्षा की कसौटी पर धर्मात्मा का उत्साह द्विगुणित हो उठता है। इंग्लैण्ड की महारानी ‘मेरी’ विधर्मियों को जीवित अग्नि में फिकवा रही थी। उत्साह इतना बढ़ा कि लोग स्वयं आ-आकर भस्मसात् होने लगे। रानी हार गई। बन्दा वीर वैरागी धर्म पर बलिदान होने को तत्पर हो गया था। वास्तविकता यह है कि विपद्-अग्नि में तपकर धर्म कुन्दन बन जाता है।
सच्चे मित्र की पहचान : सच्चा मित्र वही है जो सुख और दु:ख में परछायों के समान साथ रहे। अच्छे समय में माल उड़ाने वाले मित्र तो बहुत मिल जाते हैं। ऐसे मित्रों की संख्या अवस्थानुसार बढ़ती ही रही है; किन्तु जहाँ किसी प्रकार का कष्ट आया, निर्धनता का अभिशाप मिला, आपदा ने मुँह मोड़ा, सहायता देने को कौन कहे, मित्र कहलाने वाले भी दृष्टिगत नहीं होते। छूत की बीमारी समझकर कतराने लग जाते हैं। वर्षों का परिचय, खाया-पिया और एक साथ की रंगरलियाँ एकदम धूमिल हो जाती हैं और उनकी आँखें फिरती हैं तोते के समान। इस अवस्था में सच्चा मित्र ही काम आता है। वह अपनी मैत्री के पीछे अपना सर्वस्व बलिदान कर फूला नहीं समाता है। ऐसा करने में ही वह अपने जीवन को सार्थक समझता है। स्वयं आपदा का सामना कर मित्र को बचाता है। हल्दी घाटी के भयंकर युद्ध में जब मुस्लिम सेना ने आहत राणा प्रताप को घेर लिया था, तत्क्षण सरदार झाला ने राणा का मुकुट छीनकर और अपना बलिदान कर उनके जीवन की रक्षा की थी। इसके अतिरिक्त असंख्य ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें मित्रों ने अपना सर्वस्व न्योछावर करके मैत्री भाव को निभाया। रहीम के इन शब्दों के मर्म को समझिये-
विपत्ति कसौटी जे कसेतेई साँचे मीत ।”

व्यक्ति की शक्ति की परिचायक-आपत्ति : सच्ची सहधर्मिणी सुख-दु:ख, हर्ष-विषाद्, सम्पदा-आपदा किसी अवस्था में पति का साथ नहीं छोड़ती है, वह माता के समान हर बात का ध्यान रखती है, मंत्री के समान सत्परामर्श देती है, दास की भाँति सेवा करती है, आपकाल में कवच का काम करती है, सुख-दु:ख में सच्चे मित्र के समान छाया-सी रहती है। अबला और कोमलांगिनी कहलाने वाली भी समय पकड़ने पर पति के लिए कठिन-से-कठिन कार्य करती है और अग्नि में छलाँग लगा देती है। जो स्त्रियाँ केवल विलासता की प्रतीक हैं, दु:ख की कसौटी पर उनका अस्तित्व मोम के समान पिघल जाता है, वे सहधर्मिणी कहलाने के योग्य नहीं। आमोद-प्रमोद और सुख एवं ऐश्वर्य के दिनों में तो हर स्त्री अपना मोह एवं पत्नीत्व दिखाती है; किन्तु उसके पत्नीव्रत की परीक्षा तो तब होती है, जब पति पर आपदा के बादल मँडराने लगते हैं, कोई साथ देने वाला नहीं होता, पैसा गाँठ में नहीं होता है और दर-दर की ठोकरें खानी पड़ती हैं। ऐसे आपकाल में पतिव्रता नारी होठों पर मुस्कान लाकर पति की पीड़ा का हरण करती है, मधुर वचनों द्वारा ढाढस बँधाती है। तन, मन और आभषण आदि से सहायता करती है तथा उचित परामर्श से पति को उठाने का प्रयत्न करती है। इस अवस्था में पति अपने दु:खों को भूल जाता है।
तुलसीकृत रामचरितमानस अनभतियों से भरी पड़ी है। इनकी सीधी-सीधी चौपाइयों में ऐसे-ऐसे रत्न छिपे, हैं, जिन्हें ग्रहण कर प्राणीमात्र भवसागर को अनायास पार कर सकता है। उक्त चौपाई उन्हीं अनुभूतियों की प्रतीक है। वास्तव में धैर्य, धर्म, मित्र और पत्नी मानव की विभूतियाँ हैं। इन्हीं को प्राप्त कर मानव का गौरव समाजरूपी गगन में सूर्य के समान चमक उठता है; परन्तु इनकी परीक्षा कसौटी पर ही हो सकती है। अतः आपद् अभिशाप न बनकर वरदान ही है; पर इस काल का थोड़ा ही श्रेयस्कर है। रहीम के ये शब्द इसके साक्षी हैं –

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