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Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

पराधीन सपनेहुँ सुख नाहीं

प्रस्तावना : सामान्यतः मानव अपने जीवन में जो कुछ भी कार्य करता हैउसका एक मात्र उद्देश्य होता है कि वह अपने को सुखी कर सके। अपना विकास कर सके और जितना भी जीवन उसने जीना है उतना स्वाभाविक रूप में जी सके। लेकिन मानव का आदि काल से अब तक का इतिहास यह बताता है कि उसकी इच्छा के मार्ग में अनेक बाधाएँ आती हैं। यद्यपि वह सभी बाधाओं को दूर करने की कोशिश करता है फिर भी परिस्थितियाँ उसे ऐसा जीवन जीने पर विवश कर देती हैं जो उसको अच्छा नहीं लगता। जब हम पराधीनता के विषय में बात करते हैंतो एक तथ्य यह सामने रखना होता है कि पराधीनता की विवेचना कई दृष्टियों से हो सकती है।

पराधीनता का एक रूप है स्वतन्त्रता का न होना अर्थात् जो व्यक्ति किसी की इच्छा के अधीन होता हैउसे पराधीन कहा जाता है। यह स्वाभाविक है कि अपने अनुसार काम न करने पर व्यक्ति सुख प्राप्त नहीं कर सकता। इसीलिए कहा जाता है कि पराधीन व्यक्ति सुख प्राप्त नहीं कर सकता।

पराधीनता का अभिशाप : पराधीनता का अभिशाप सबसे बड़ा अभिशाप है। यदि यह पूछा जाए कि इस विश्व में कौन ज्यादा सुखी हैतो एक उत्तर यही होगा कि जो स्वतन्त्र है या पराधीन नहीं है वह सुखी है। सुख यद्यपि बाहरी वस्तुओं पर निर्भर करता है। फिर भी उसकी वास्तविक सत्ता अन्तर में विद्यमान रहती है। हम जब पराधीन होते हैंतो कुछ भी अपनी इच्छा से नहीं कर सकते और हमें प्रत्येक काम के लिए दूसरे की इच्छा पर निर्भर रहना पड़ता है। यह जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है।

पराधीनता का दूसरा रूप है गुलामी : प्राचीन काल में दास प्रथा थी। अमीर व्यक्ति गरीब दासों को खरीद लिया करते थे। उनके अधिकार समाप्त हो जाते थे। उनका खाना-पीना या अन्य काम मालिक पर निर्भर करता था। धीरे-धीरे यह दास प्रथा समाप्त हुई। इसकी समाप्ति का कारण था कि मानवों में स्वाधीनता की चेतना जाग गई थी और वे पराधीनता के दुर्गुण समझने लगे थे। उन्होंने इस विषय में आन्दोलन किए और अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिये खुन की क्रान्तियाँ भी हुईं। इस विषय में प्राचीन राजसत्ता की चर्चा भी की जा सकती है। राजतंत्र में सामान्यत: शासक के विपरीत कुछ भी कहने की स्वतन्त्रता नहीं होती है। उसे भी एक प्रकार की पराधीनता ही समझना चाहिए।

व्यक्ति के सन्दर्भ में : वस्तुत: इस बात को व्यक्ति और राष्ट्र दोनों के संदर्भ में देखा जा सकता है। जो व्यक्ति पराधीन होता है उसका विकास रुक जाता हैउसमें अपने आप स्वतन्त्रता से निर्णय लेने की शक्ति समाप्त हो जाती है। उसमें हीन भावना आ जाती है। इस तरह जो व्यक्ति पराधीन होता हैउसे जीवन के सुख मिलने दूभर हो जाते हैं। तुलसीदास जी ने इस बात को चाहे नारी के प्रसंग में कहा होपर यह उक्ति सभी पर चरितार्थ होती है। भारतीय समाज में जैसा कि पहले दासों के विषय में कहा गया हैस्त्रियों की दशा भी अच्छी नहीं रही। यद्यपि यह विवाद का विषय है कि प्राचीन काल में स्त्रियों को स्वतन्त्रता प्राप्त शी या नहीं। दोनों ही बातों के पक्ष में प्रमाण मिल जाते हैं और यह भी सर्वविदित है कि नारी की दशा हमारे देश में बहुत अच्छी नहीं रही। सभी धर्म शास्त्रों में उसे हर दशा में पुरुष की छाया या अनुगामिनी बताया गया है। उसके सभी अधिकारों को पितापति और पुत्र के अधीन कर दिया गया। आधुनिक काल में साहित्यकारों में सभी कवियों व लेखकों ने नारी की इस दशा पर लिखा और उसकी स्वतन्त्रता की माँग की थी-कविवर पंत ने लिखा है :

मुक्त करो नारी को ।
चिर वन्दिनी सुकुमारी को ।।

और प्रसाद जी ने ध्रुवस्वामिनी में इस समस्या को उभारा है। उन्होंने ध्रुवस्वामिनी के मुख से कहलवाया है कि पराधीनता की भावना उसकी नस-नस में युगों से समा गई है। एक स्वतन्त्र राष्ट्र और अच्छे समाज का निर्माण करने के लिए नारी की स्वतन्त्रता ही नहींप्रत्येक व्यक्ति की स्वतन्त्रता आवश्यक होती है। हम देख रहे हैं कि जहाँ पर नारी स्वतन्त्र है वहाँ पर और चाहे कुछ दुर्गुण समाज में आ गये होंपर समग्र राष्ट्र की उन्नति हुई है।

राष्ट्र के सन्दर्भ में : किसी भी राष्ट्र के सन्दर्भ में यह उक्ति अधिक विचार का विषय बन सकती है। जब कोई राष्ट्र पराधीन होता हैतो उसकी जनता सुखी नहीं रह सकती। पराधीन बनाने वाला राष्ट्र (देश) अपने लाभ की बातें करता है। भारत को ही लीजिये। अंग्रेजो की दासता के समय भारतीय जनमानस का विकास रुक गया। हमें अपनी सभ्यता और संस्कृति पर दूसरे देश की सभ्यता और संस्कृति का प्रभाव स्वीकार करना पड़ा। इससे यद्यपि कुछ लाभ भी अवश्य हुआ पर पराधीनता के लाभ से स्वाधीनता की हानि कहीं अधिक श्रेयस्कर मानी गई है। भारतवासियों ने पराधीनता की बेड़ी काटने का यत्न किया। पराधीनता के दिनों की दशा का मार्मिक वर्णन भारतेन्दु की रचना में हुआ है:

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