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Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

जीवन-मरण विधि हाथ

प्रस्तावना : मानव स्वयं अपना भाग्य निर्माता है। वह अपनी इच्छानुसार हर कार्य कर सकता है। उसका भविष्य उसकी अपनी मटठी में है। यह धुन पुरातन युग से सुनी जा रहा है। इसी का मनन कर हम कर्मरत हैं। पर इसका फल कौन देता है ? इस पर कभी सोचा नहीं, विचारा नहीं। जब पता चलता है कि फलदाता भगवान् है, इंसान नहीं, तब उसकी विचारधारा में एक नया मोड़ आ जाता है और वह भाग्यवादी बन जाता है।
इस प्रकार निरन्तर प्रयास करने वाला प्राणी भगवान के हाथ की कठपुतली बनकर रह जाता है। उसका हर कार्य, हर प्रयास ईश्वर पर आश्रित हो जाता है और हर कार्य के फल के रूप में उसके मुख से निकलता है, ऐसा ही था विधि का विधान, यह सब उसी का खेल है।
मानव जीवन में उसे कब लाभ होगा और कब हानि होगी, इससे वह अनभिज्ञ है ? किसे, कब मृत्यु अपने विकराल पंजों में जकड़ लेगी, यह कोई नहीं जानता ? कौन यश का भागी होगा और कौन अपयश का, इस विषय में भी कोई नहीं जानता ? यह सब कुछ विधि के हाथ की बात है। जो कुछ, जिस इंसान के भाग्य में लिखा हुआ है, वह उसे भोगना अवश्य पडेगा। इसके बिना उसकी मुक्ति नहीं। विधि के विधान में क्या राजा क्या रंक सब बराबर हैं ? समय आने पर सभी किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाते हैं। उन्हें ऐसा प्रतीत होता है कि सभी साधन उपलब्ध होते हुए भी वे कुछ भी नहीं, अपितु विधाता के हाथ की कठपुतली मात्र हैं।
हानि-लाभ विधि हाथ : मानव जीवन भर मार-मार करता चला जाता है; पर उसे किस मार्ग से कब लाभ होगा या कब हानि, यह नहीं जानता। असाधारण पुरुष की तो बिसात ही क्या, युगस्रष्टा राम को ही ले लीजिए, जिसकी सीता जैसी पत्नी, लक्ष्मण सरीखा भाई और जिनके राज्यतिलक की पुण्य तिथि वशिष्ठ जैसे महर्षि ने बहुत सोच-समझकर निकाली, उन्हें भी विधि की विडम्बना ने नहीं छोड़ा। अपना राज्य खोना पड़ा। इतना ही नहीं, 14 वर्ष की दीर्घ अवधि के लिए वनवासी बनना पड़ा। कहाँ राज्य की प्राप्ति और सुख, कहाँ वन विचरण और जीवन की कठोरता । लाभ के स्थान पर हानि ही हाथ लगी।
इससे स्पष्ट है कि कोई लाभ-हानि के विषय में कुछ नहीं कह सकता। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि लोगों की लाटरी निकल आती है। क्षणमात्र में ही सारी आर्थिक कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं। यह सब भाग्य का ही खेल है। इसी की बदौलत एक भिश्ती एक दिन के लिए भारत का शासक बन जाता है। विधि का विधाम बहुत ही अनोखा है। इसके विषय में मानव स्वयं ही सोचने लगता है कि उसके पास क्या शक्ति है। उसके तो हर मार्ग में, हर स्थान पर समय ही आगे चल रहा है।
यश-अपयश विधि हाथ : यश-अपयश भी विधाता की ही देन है। वह अपनी इच्छानुसार ही किसी को यश और किसी को अपयश देता है। देव इन्द्र ने अनेक बार अपना सिंहासन खोकर अपयश पाया, गौतम की पत्नी अहिल्या के प्रेम-पाश में उसे कम नहीं सुनने को मिला। फिर भी आज वह देवराज इन्द्र ही कहलाते हैं। बचपन में मोहनदास कर्मचन्द को देखकर कौन कह सकता था कि एक दिन यही बालक राष्ट्रपिता के नाम से स्मरण किया जाएगा। सारा विश्व उनकी अहिंसा की शक्ति का लोहा मानेगा। ये हैं सब यश की गाथाएँ।
अब अपयश के क्षेत्र में विधाता की करनी को देखिये। सोवियत संघ को उन्नत करने वाला स्टालिन मृत्यु के बाद अपयश का भागी बनाः परन्तु आज समय की धीमी गति के साथ-साथ उसका सम्मान बढ़ता जा रहा है। इण्डोनेशिया के राष्ट्रपति सुकार्यों की ही गाथा को ले लीजिए। स्वतन्त्रता संग्राम के इस सेनानी को इण्डोनेशिया की स्वतन्त्रता के बाद कितना सम्मान मिला। वहाँ की जनता ने राष्ट्रपति पद पर उसका स्वागत किया। चहुँ ओर जय-जयकार हुई। विश्व सम्मान मिला। पर विधाता की एक ही ठोकर ने उसे आसमान से धरती पर ला पटका । देखते-देखते वह अपयश का भागी बन गया। आज इण्डोनेशिया में उसे कोई नहीं पूछता। अत: स्पष्ट है कि यश-अपयश विधि हाथ में ही है।
जीवन-मरण विधि हाथ : जीवन-मरण भी विधाता की ही मुट्ठी में है। कोई नहीं जानता कि कब मौत उसे अपने विकराल पंजों में ले ले और कब वह विशेष परिस्थितियों में फंसकर भी जीवित निकल इससे स्पष्ट है कि कोई लाभ-हानि के विषय में कुछ नहीं कह सकता। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि लोगों की लाटरी निकल आती है। क्षणमात्र में ही सारी आर्थिक कठिनाइयाँ दूर हो जाती हैं। यह सब भाग्य का ही खेल है। इसी की बदौलत एक भिश्ती एक दिन के लिए भारत का शासक बन जाता है। विधि का विधाम बहुत ही अनोखा है। इसके विषय में मानव स्वयं ही सोचने लगता है कि उसके पास क्या शक्ति है। उसके तो हर मार्ग में, हर स्थान पर समय ही आगे चल रहा है।
यश-अपयश विधि हाथ : यश-अपयश भी विधाता की ही देन है। वह अपनी इच्छानुसार ही किसी को यश और किसी को अपयश देता है। देव इन्द्र ने अनेक बार अपना सिंहासन खोकर अपयश पाया, गौतम की पत्नी अहिल्या के प्रेम-पाश में उसे कम नहीं सुनने को मिला। फिर भी आज वह देवराज इन्द्र ही कहलाते हैं। बचपन में मोहनदास कर्मचन्द को देखकर कौन कह सकता था कि एक दिन यही बालक राष्ट्रपिता के नाम से स्मरण किया जाएगा। सारा विश्व उनकी अहिंसा की शक्ति का लोहा मानेगा। ये हैं सब यश की गाथाएँ।
अब अपयश के क्षेत्र में विधाता की करनी को देखिये। सोवियत संघ को उन्नत करने वाला स्टालिन मृत्यु के बाद अपयश का भागी बनाः परन्तु आज समय की धीमी गति के साथ-साथ उसका सम्मान बढ़ता जा रहा है। इण्डोनेशिया के राष्ट्रपति सुकार्यों की ही गाथा को ले लीजिए। स्वतन्त्रता संग्राम के इस सेनानी को इण्डोनेशिया की स्वतन्त्रता के बाद कितना सम्मान मिला। वहाँ की जनता ने राष्ट्रपति पद पर उसका स्वागत किया। चहुँ ओर जय-जयकार हुई। विश्व सम्मान मिला। पर विधाता की एक ही ठोकर ने उसे आसमान से धरती पर ला पटका। देखते-देखते वह अपयश का भागी बन गया। आज इण्डोनेशिया में उसे कोई नहीं पूछता। अत: स्पष्ट है कि यश-अपयश विधि हाथ में ही है।
जीवन-मरण विधि हाथ : जीवन-मरण भी विधाता की ही मुट्ठी में है। कोई नहीं जानता कि कब मौत उसे अपने विकराल पंजों में ले ले और कब वह विशेष परिस्थितियों में फंसकर भी जीवित निकल आए। इतिहास इसका साक्षी है कि हिरण्यकश्यप ने अपने ईश्वरभक्त प्रह्लाद को मारने के लिए दया कुछ नहीं किया; पर उसका बाल-बाँका नहीं हुआ। अंत में स्वयं को जीवन से हाथ धोना पड़ा। अमरत्व के वरदान धरे के धरे रह गए। यह रही जीवन की गाथा।
अब लीजिए मरण की बात। अनेक बार यह सुनने को मिला है। कि अमुक व्यक्ति सोते का सोता ही रह गया, अमुक ठोकर खाते ही चल बसा, अमुक के हाथ में ग्रास ही अटका रह गया, अमुक गुसलखाने में नहाने गया, तो वापस लौटा ही नहीं। इससे स्पष्ट है कि मृत्यु का कुछ पता नहीं, कब आ जाए ? भारतीय इतिहास के कुछ वर्षों के पृष्ठ ही उलट कर देख लोजिए। 10 जनवरी सन् 1966 को वह दिन, जब ताशकंद समझौते पर दो महारथियों ने हस्ताक्षर किए। भारत-पाक के ऊपर से संघर्ष के बादल छंट गए। विश्व भर में खुशी का साम्राज्य छा गया; पर किसे पता था कि ऐसी खुशी के अवसर पर भारत जननी अपने सच्चे सपूत को सदैव के लिए खो देगी। ‘जय जवान जय किसान’ का नारा देने वाला अनायास ही सदा के लिये सो जायेगा। इस प्रकार शास्त्री जी का काल के ग्रास में समा जाना भाग्य की विडम्बना ही है. इसके अलावा और कुछ नहीं। मानव का तेज़, उसकी शक्ति और उसकी प्रखर बुद्धि सब कुछ नियति के सम्मुख फीकी है। उसके आगे उसकी कुछ नहीं चल सकती।
उपसंहार : इससे स्पष्ट हो जाता है कि कर्म की गति टालने से भी नहीं टल सकती है। मानव-जीवन में हानि-लाभ, जीवन-मरण, यश-अपयश सभी कुछ विधि हाथ है और मानव उसका खिलौना मात्र है। पर इसका यह तात्पर्य कदापि नहीं कि हम भाग्यवादी बनकर निष्क्रियता को अपनाकर कायरों का-सा जीवनयापन करें । हमें तो फलाफल से दूर होकर निष्काम भाव से कर्मरत रहना चाहिए। किसी कवि ने सच ही कहा है :

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