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Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

बिनु भय होय न प्रीति


प्रस्तावना : मनुष्य सृष्टि की अद्भुत रचना है। वह अपने निर्माणकर्ता की शक्ति का प्रतीक है। उसने जल, थल और नभ मंडल सभी पर आशातीत विजय प्राप्त कर ली है। अब प्रकृति उसकी सहचरी बन चुकी है और शक्तियाँ उसकी सेविकाएँ; पर ऐसे शक्तिशाली प्राणी को भी किंकर्तव्यविमूढ़ बनाने वाली एक शक्ति है-भय। इसके आगे उस बलशाली का तेज़ फीका पड़ जाता है। तब उसे अपनी दयनीय स्थिति का बोध होता है- इस ब्रह्माण्ड में अणु से भी क्षुद्र है वह। लेकिन इसके विपरीत वह है क्या, हर मानव स्वयं को अमर समझता है। शक्ति के सिद्धान्त पर उसका विश्वास दृढ़ हो चुका है। उस्का विश्वास है कि बिना भय के प्रीत नहीं हो सकती। हमारा पुरातन इतिहास भी इस कथन का साक्षी है। सृष्टि का उद्गम भी इस आधार पर हुआ, जो निर्बल पर सबल के आधिपत्य को स्वीकार करता है। भय से ही शान्ति का जन्म होता है। अत: शान्ति-स्थापना के लिए कभी-कभी युद्ध आवश्यक हो जाते हैं। प्रत्यक्ष रूप से ये संघर्ष शान्ति के स्थापक हैं। एक प्राणी दुसरे प्राणी से प्रीत करने के लिए क्यों विवश होता है ? वह जानता है कि सबल सदैव से निर्बलों का रक्त चूसता आया है। यदि उससे प्रीत न की गई, चाहे वह डर के कारण ही क्यों न हो, तो उसका हित न होगा।
भय का समावेश : हर युग का आतंकवाद एवं भयवाद का नारा शुरू से ही अबाध गति से लगता चला आ रहा है। समाज में, राष्ट्र में मानव मानव वेष में हमेशा भयानक एवं बूंखार व्याघ्र तथा भेड़िये रहे हैं और भविष्य में रहेंगे भी। मृत्यु से सभी भयभीत रहते हैं; किन्तु इसका यह तात्पर्य नहीं है कि मृत्यु से भयभीत होकर कोई प्राणी किसी से भी प्रीत नहीं करता। वह मृत्यु के कष्टों से छुटकारा पाने के लिए किसी न किसी ओर अवश्य झुकता है और यही कारण है कि जब वह अपनी सीमा से बद्ध बुद्धि से परे कोई कार्य देखता है, तो वह तत्काल ही किसी अज्ञात दैवी शक्ति पर विश्वास करने लग जाता है और अपनी सहायतार्थ उसका आह्वान करता है, भले ही दैवी शक्ति उसके अंतर का पुंज हो ; किन्तु उसको सोचने-विचारने का उसके पास वक्त ही कहाँ है ? उसमें डरपोकपन धीरे-धीरे पड़ जाता है और भय का उसके अन्तर में समावेश हो जाता है। तब उससे बचने के लिए उसमें दूसरी शक्ति के प्रति विश्वास उत्पन्न होना शुरू हो जाता है।
मानव में अधिकार की प्रवृत्ति : प्रायः हम देखते हैं कि मनुष्य कभी एक कार्य करता है और कभी दूसरा, यह सब कुछ है। परिस्थितिवश । जब जो परिस्थिति उसे जैसा कार्य करने के लिये बाध्य कर देती है, वह वैसा ही करने लग जाता है। इस कारण उसका मन एक सा नहीं रह पाता। सृष्टि की यह अद्भुत रचना प्राणी, भूख के भय से अन्न से प्रीत करने लग जाता है; क्योंकि वह उसकी भूख को शांत करती है। भयावह वस्तु को देखते ही वह सुन्दर वस्तु से प्रीत करने लगता है। क्षुधा से पीड़ित कंगालों को देखकर उसका हृदय दया से द्रवित हो उठता है। वस्तुओं पर अधिकार करने की प्रवृत्ति भी स्वाभाविक ही है। जो उनसे वंचित करने का प्रयास करता है, उससे वह संघर्ष करता है और अपना अधिकार स्थापित करने का प्रयास करता है। फलतः जब मनुष्य में किसी वस्तु के प्रति भय का संचार होता है, तो वह उससे बचने का सहारा हूँढने लग जाता है। उस सहारे को पाते ही उसमें प्रीति अवश्यम्भावी हो उठती है। यही है वह सिद्धांत जिससे हर मनुष्य को शक्ति मिलती है।
भय से प्रीति की उत्पत्ति : कुछ विचारकों का मत ऐसा रहा है कि शांति से भय का नाश होता है; किन्तु अब वह बात लगभग सभी को ठीक-सी प्रतीत होने लगी है। इसके साक्षी हैं विश्व के दो महायुद्ध। जिनके स्मरण मात्र से ही सबके रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उस भीषण संहार का दृश्य उपस्थित होते ही सभी भयवश शांति का सम्बल लेना चाहते हैं। इसी शांति के प्रयास में सारा विश्व दिन-रात प्राण-प्रण से लगा हुआ है ; पर क्या यह असम्भव है ? आज भी कुछ शक्तिशाली राष्ट्र दुर्बल राष्ट्रों पर अपनी बात मनवाने के लिए विशेष शक्ति का प्रयोग कर रहे हैं। कुछ राष्ट्र मानकर उनके युद्ध में सम्मिलित हो गए हैं। इस तरह इस एक भय से निस्तार पाने के लिये तृतीय महायुद्ध की अग्नि प्रज्वलित करने का प्रयास किया जा रहा है।
युद्ध विभीषिका से बचने के लिए सबल का सहारा लिया ; पर एक सबल दूसरे सबल को कैसे देख सकता है ? यह विचित्र बात ही है जिस भय से प्राण पाने के लिये दूसरे में प्रीत की भावना जागृत हुई और वही भय पुनः उसी ओर ले जाने को तैयार है जिधर से वह भागना चाहता है। ऐसी ही स्थिति पुरुषोत्तम राम के सम्मुख भी आई। सागर के उस पार जाने के लिये सागर से विनम्रतापूर्वक राह की याचना की; किन्तु सागर ने किंचित मात्र भी परवाह नहीं की। कारण वह जानता था कि याचना तो केवल दुर्बलता का प्रतीक है। यदि ये शक्तिशाली होते, तो स्वयं ही राह हूँढ लेते। यही बात सभी ऐसी स्थिति में सोचते हैं। यह प्राकृतिक नियम है। सागर को उस समय भान हुआ, जब पुरुषोत्तम राम ने दुर्बलता का चोला उतारकर धनुष बाण सम्हाला तो वह प्राण जाने के भय से उनकी शरण में आया और सहर्ष राह प्रदान की। यह है भय जो सबल को निर्बल, क्रोधी को शांत, दुर्व्यसनी को साधु, निर्दयी से सदयी बना देता है। अत : यह सत्य है कि जब मनुष्य में किसी प्रश्न को लेकर भय का संचार होता है तभी उसमें दूसरों से प्रेम करने की इच्छा जागृत होती है। प्रबल शत्रु को देखकर ही दृढ मित्रता स्थापित करने की इच्छा होती है, जो बाद में प्रीति में बदल जाती है। वनवासी ऋषि मुनिजन से इसलिए प्रीत नहीं करते थे कि वे त्यागी थे, अपितु उनके क्रोध व शाप के भय से भयभीत होकर उनसे प्रीत करते थे। इसी कारण उनका आदर एवं सत्कार किया जाता था। अत : बिना भय के प्रीत वास्तव में किसी के साथ सम्भव नहीं।

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