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Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

महात्मा गाँधी बापू


जन्म, वंश परिचय और शिक्षा- जब 19 वीं सदी की साँझ थी, 2 अक्तूबर 1869 को पोरबन्दर के दीवान की कोठी में इस युग में क्या, युग युगों के महानतम व्यक्तित्व ने प्रथम बार अपनी पलकें खोलीं। वे थे विश्ववन्द्य बापू। उनका पूरा नाम था मोहनदास कर्मचन्द गाँधी।
वैभव और सम्पन्नता के शैशव में वे शिशु से किशोर हुए। जबकि वे अध्ययन में लगे हुये थे तभी उनके पिता का देहान्त हो। गया। 17 वर्ष की अवस्था में जब वे अध्ययन के लिये इंगलैंड जाने लगे, तो उस समय एक पुत्र  के पिता बन चुके थे।
दक्षिण अफ्रीका गमन और भारतीयों का प्रतिनिधित्व : इंग्लैंड के विशाल वातावरण में भी अपने व्यक्तित्व में अछूते फूलों की-सी पवित्रता रखते हुए उन्होंने वकालत  की योग्यता प्राप्त कर ली। वहीं उनके जीवन का विकास हुआ। बम्बई वापस लौटने पर माता की मृत्यु का शोक समाचार सुना। फिर वे कुछ दिनों तक वकालत करते रहे ; परन्तु उसमें सफलता हाथ न लगी। तभी पोरबन्दर की एक कम्पनी के वकील होकर वे दक्षिणी अफ्रीका गये। वहाँ भारतीयों का होता अपमान सहन न कर सके और इस पर चोटें खाई ईंट और पत्थर से।
बापू ने ‘नेटाल इण्डियन कान्फ्रेंस’ नाम से एक युग की स्थापना की। ऐसे युग की जिसमें मानवता, अन्याय और घृणा का प्रतिशोध प्रेम और न्याय से लिया जाता था। इसके कुछ दिनों के उपरांत ही वे भारत लौट आये। घूम-घूमकर अफ्रीका में होने वाले भारतीयों पर अत्याचारों का रूप जनता के सम्मुख खड़ा कर दिया। अंग्रेजों के विरुद्ध दक्षिणी अफ्रीका में एक बहुत बड़ा विप्लव हुआ जिसमें बापू जी ने सेवक बनकर कार्य किया। जिन गोरों ने उन पर पत्थर बरसाये थे। उन्हीं के घावों को उन्होंने धोया। जिन्होंने उनकी बेइज्जती की थी उन्हीं की जाने बचाईं घृणा और मृत्यु के बदले मई प्रेम और जीवन का वरदान देने वाले बापू को देखकर देवताओं के नेत्र भी सजल हो उठे होंगे।
काले कानून का बहिष्कार : इस पर भी गोरों के अत्याचार दिन और रात के समान बढ़ते ही गए, तो बापू ने फोनिक्स में एक आश्रम की स्थापना की और ‘इण्डियन ओपिनियन’ नामक एक समाचारपत्र निकाला। उसी के पश्चात् की कहानी संघर्षों की एक लम्बी गाथा है। ‘काला कानून’ जिसके अनुसार हर भारतीय को अपने अँगूठे की छाप देनी होती थी। भारतीय विवाह नाजायज करार दे दिये। सारे भारतीयों पर एक मौत का सन्नाटा छाया हुआ था। उस समय बापू की एक ही आवाज़ ने मुर्दी में जान डाल दी और वे अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिये चल दिये दल बाँधकर। उनकी जादू भरी आवाज़ ने हमें जानवरों की बजाय इन्सान बना दिया और फिर हमने रगों में लाल रक्त की अधिकता महसूस की और विश्व ने आश्चर्य से निहारा कि किस प्रकार से सदियों की गुलाम कौम ने करवट ली और हुँकार उठी। अन्त में आवाज पर विजय का सेहरा बँधा और भारतीय विवाह जायज करार दे दिया गया। ‘काला कानून’ हटा दिया गया और जनरल स्मट्स को झुकना पड़ा। इसी बीच में प्रथम महासमर छिड़ा और बापू के कथनानुसार भारतीयों ने उसमें सहायता की।
चम्पारण आन्दोलन : सन् 1915 में बापू स्वदेश लौटे। भारत ने बाहें फैलाकर अपने मसीहा, अपने पैगम्बर का स्वागत किया। उन्हें ‘महात्मा’ कह कर पुकारा। सारे भारत का भ्रमण करके उन्होंने साबरमती को अपना साधना स्थल चुना और वहीं अपना आश्रम स्थापित किया। वहाँ पर भी शांति न मिली और चम्पारण के नील की कोठियों से उठती हुई दर्द और कराहट की आवाज़ ने उन्हें बेचैन कर डाला और वहाँ आन्दोलन द्वारा शांति स्थापित की।
प्रथम बार उपवास : थोड़े समय पश्चात् ही अहमदाबाद के मिल मजदूरों के आन्दोलन के सिलसिले में प्रथम बार ही उन्होंने अपने जीवन में उपवास किया। सन् 1918 ई० में दिल्ली में युद्ध सम्मेलन हुआ और महात्मा जी ने स्वयं रंगरूटों की भर्ती करने में सहायता दी; परन्तु स्वास्थ्य ठीक न रहने के कारण उन्हें बकरी के दूध की शरण लेनी पड़ी।
असहयोग आन्दोलन : इधर तो भारतीय रोलट एक्ट का विरोध कर रहे थे। उधर पंजाब की धरती खून से रंग उठी। जलियाँवाला बाग में सैकड़ों निर्दोष गोलियों से भून दिये गए और खुरेंजी की एक भयंकर लेहर ने सारे भारत को डुबो दिया। किन्तु 40 करोड़ भारतीयों का पाप अपने सिर बापू ने ले लिया और तीन दिन तक उपवास किया। इस पर 1 अगस्त 1920 को उन्होंने फिर असहयोग आन्दोलन आरम्भ कर दिया। ख़िलाफ़त और स्वराज्य दोनों की आवाजें उठीं और विदेशी उपाधियों, विद्यालयों, अदालतों और विदेशी कपड़ों का बहिष्कार कर दिया और प्रिन्स ऑफ वेल्स के आगमन के समय विदेशी कपड़ों की आग की रोशनी से ब्रिटेन के समाज और तख्त थर्रा उठे।
इस पर भी जनता अपने पर नियन्त्रण न रख सकी। बम्बई में गोली काण्ड हुआ। उसकी प्रतिक्रिया में जनता ने पुलिस को थाना जला दिया। इससे बापू को बड़ा दु:ख पहुँचा और उन्होंने पाँच दिन का उपवास किया।  
साइमन कमीशन का विरोध : 10 मार्च 1922 को बापू को ब्रिटिश सरकार का आतिथ्य ग्रहण करना पड़ा। परन्तु शारीरिक अवस्था ठीक न होने के कारण सरकार उन्हें अधिक दिन तक मेहमान न बना सकी। तत्पश्चात् उन्होंने साइमन कमीशन का विरोध ‘साइमन लौट जाऔ’ के नारे के साथ किया। जिससे ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिल गई। फिर वे नमक कानून तोड़ने के अपराध में बन्दी बना लिये गये। गाँधी-इर्विन समझौते पर ही पुन : छोड़े गये। इसी कारण कितनी ही बार उन्हें अनशन करने पड़े और कितनी ही बार सरकारी आतिथ्य ग्रहण करना पड़ा इसी बीच में द्वितीय महासमर छिड़ गया। भारत को बिना उसकी सलाह के समर में सम्मिलित घोषित कर दिया गया।

भारत छोड़ो आन्दोलन : बापू ने क्रिप्स प्रस्ताव को ‘बेकाम चैक’ बताकर अस्वीकार कर दिया। तत्पश्चात् उन्होंने ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ की आवाज उठायी। ब्रिटिश राज्य जिसमें कभी सूरज डूबता ही नहीं था, काँप उठा।
अगस्त क्रान्ति : सन् 1942 में कांग्रेस ने भी उसी प्रस्ताव का समर्थन किया और 9 अगस्त को सभी नेता बन्दी बना लिये गए। ज्वालामुखी के शिखर उठा लिये गए और भारत धधक उठा। तत्पश्चात् अगस्त की महान् क्रान्ति हुई, जिसमें अंग्रेजों ने जी भरकर भारतीयों को कुचला और उत्तरदायित्व भी बापू और कांग्रेस के माथे पर थोप दिया गया।
कस्तूरबा से विछोह : फिर बापू ने 21 दिन का उपवास किया। और सरकार ने उन्हें वहीं छोड़ दिया। इसी बीच मौत ने उनसे भाई महादेव देसाई को छीन लिया था। फरवरी मास में कस्तूरबा ने भी उनका साथ छोड़ दिया। 6 मई सन् 1944 को इन दो मौतों की पीड़ा से व्यथित ‘बापू’ को सरकार ने छोड़ दिया। फिर वे बम्बई गये और कायदे आज़म से भेंट की।
अन्तरिम सरकार : इसके बाद कान्फ्रेंसों का एक लम्बा दौर चला। शिमला कान्फ्रेंस अभी भूली नहीं थी। 12 मई 1946 को नई योजना आई और अन्तरिम सरकार बनी ; किन्तु 16 अगस्त के बाद बंगाल में भयंकर हत्याकांड आरम्भ हो गया। अपनी जीवन संध्या में इन हत्याकांडों से बापू का दिल सिहर उठा। बापू पैदल गाँव-गाँव में शांति का अलख जगाते हुए चल पड़े। परन्तु अग्नि पूर्ण रूप से धधक उठी थी, बंगाल में दबी, बिहार में फिर धधक उठी।
भारत विभाजन : सन् 1947 में बिहार पहुँचे, वहाँ का दंगा शांत किया। इसके पश्चात् तो जैसे पशुता और रक्तपात ने बापू को चैन न लेने दिया। 15 अगस्त 1947 को जब भारत भर में स्वतन्त्रता की खुशियाँ मनायी जा रही थीं। उस समय बापू कलकत्ते में साम्प्रदायिक शान्ति कराने में व्यस्त थे। वहाँ पर भी उन्हें उपवास करना पड़ा। कलकत्ते के ठण्डे होते ही दिल्ली धधक उठी। 8 सितम्बर 1947 को बापू दिल्ली पहुँचे। कौन जानता था कि दिल्ली में जहाँ इतनी बादशाहते समाप्त हुई, वहीं इस देश के भक्त को भी अपनी मौत देखनी पड़ेगी ? 13 जनवरी 1948 को उन्होंने अपना अन्तिम उपवास किया। सारा देश थर्रा उठा। नेताओं ने शान्ति स्थापना का वचन दिया। बापू ने उपवास तोड़ा।
मृत्यु : बिरला भवन में 30 जनवरी 1948 की संध्या को राष्ट्रपिता प्रार्थना सभा में जा रहे थे, वहीं पर एक मराठे हिन्दू नाथूराम गोडसे ने 3 गोलियों से महान् आत्मा का अन्त कर दिया। भारत के गगन का सूर्य अस्त हो चुका था। भारत की आत्मा का प्रकाश बुझ चुका था और आगे क्या होगा, उसको सोचकर मन काँप उठता था ? आपकी समाधि राजघाट पर बनी हुई है।
उपसंहार : विश्ववन्द्य बापू सत्य के प्रतीक थे। उन्होंने ही अव्यवस्थित भारत को सुव्यवस्थित किया था। वे देश में रामराज्य देखना चाहते थे; पर वह सपना साकार न हो सका। फिर भी मानवता के इतिहास में बापू का नाम सदैव अमर रहेगा ।

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