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Think India Journal popularly known as Think India Quarterly is now UGC Care listed. We are accepting submissions for publication, send papers for review to editor@eduindex.org Title of the document As the journal is published quarterly, we call it Think India Quarterly, some people call it Think India journal as it is a journal.

अपना गिरेबान


जितनी जल्दी हमारे व्यापारियों को यह समझ में आ जाए, उतना ही उनका भला होगा. विडम्बना है कि गंगा उल्टी बही यानी इससे पहले कि हम अपने देशी उपभोक्ताओं की पुकार सुनते, हम बाकी दुनिया का सहायता-केन्द्र यानी कॉल सेंटर बनने लगे. पर अब हमें ऐसी चीज़ों की आदत सी हो गई है. विडम्बनाएँ हमारे लिए अपवाद कम नियम ज़्यादा बन गईं हैं. पर जो भी हो, आखिर गंगा को सीधा बहना ही था. देरी और प्रतीक्षा बस इसकी थी कि कब हमारे व्यापारी, उत्पादक और सेवाप्रदाता बाकी दुनिया के सेवा-स्तर तक पहुँचें और अपने उपभोक्ताओं की सुध लें. लगता है कि कुछ को सद्बुद्धि आई है. टाइम्स आफ़ इंडिया लिखता है:
Call centres in the city are on the lookout for candidates who have command over their native language, be it Gujarati, Marathi, Bengali, Kannada, Oriya, Malyalam, Telugu or Punjabi. Ranjeet P, director of one such outsourcing company in the city, says, the trend can be attributed to the fact that after catering to clients from abroad, call centres are spreading their web across the country to bolster domestic business. 'We do a lot of back office work for domestic companies. Many of these companies based in other parts of the country look for people who can speak their regional language because it helps in better understanding their requirements.' Umesh Patwardhan, assistant manager with another call centre, explains that people who have a command over a regional language, besides English and Hindi, can really rake a moolah. 'When you are in a business that depends so much on what and how you speak, it becomes important that you hire people who understand a language well. Local lingo, makes your job much easier,' Patwardhan goes on.


मेरे विचार से, सहायता सेवाओं और आन्तरिक काम-काज निष्पादन (back office processing) कम्पनियों का भविष्य और फ़ायदा अपने गिरेबान में झाँकने में निहित है. लम्बी अवधि में अपने देश के व्यापार से ही उनकी रोजी-रोटी चलनी है. दुनिया का बैक-ऑफ़िस बनना अल्पकालिक फ़ायदा है, जो कि कभी भी कोई दूसरा सस्ता और अधिक आकर्षक स्थान हमसे छीन सकता है (चीन, ताइवान, फ़िलिपीन पहले ही तैयारी कर रहे हैं). इन सेवा-प्रदाता कम्पनियों को अपने घर की ओर देखना चाहिए क्योंकि यहाँ न केवल अपार संभावनाएँ हैं बल्कि भविष्य के लिए एक विशेष सुरक्षा भी है. भारतीय भाषाओं की विविधता को देखते हुए मुझे नहीं लगता कि किसी और देश में यह क्षमता आसानी से उत्पन्न हो सकती है कि वह हमारा यानी भारत का बैक-ऑफ़िस बन सके. स्थानीय भाषाओं में प्रवीणता इस व्यापार की मुख्य शर्त है. और यही शर्त, शायद किसी भी और चीज़ की बजाय, घुटती (या घोटी जा रही) भारतीय भाषाओं के लिए सबसे अच्छी खबर है. क्योंकि, बिल क्लिंटन के चुनावी नारे के शब्दों में कहें तो - "it's the economy, stupid!

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