सत्य की शक्ति

संत कबीर द्वाारा सचे गए इस सूक्ति परक दोहे का सीधा और सरल अर्थ इस प्रकार किया जा सकता है कि इस नाशवान और तरह-तरह की बुराईयों से भरे विश्व में सच बोलना सबसे बड़ी सहज-सरल तपस्या है। सत्य बोलने, सच्चा व्यवहार करने सत्य मार्ग पर चलने से बढक़र और कोई तपस्या है, न ही हो सकती है। इसके विपरीत जिसे पाप कहा जाता है। बात-बात पर झूठ बोलते रहना, छल-कपट और झूठ से भरा व्यवहार तथा आचरण करना उन सभी से बड़ा पाप है। जिस किसी व्यक्ति के हृदय में सत्य का वास होता है। ईश्वर स्वंय उसके हृदय में निवास करते हैं। जीवन के व्यावहारिक सुख भोगने के बाद अंत में वह आवागमन के मुश्किल से छुटकारा भी पा लेता है। इसके विपरीत मिथ्याचरण-व्यवहार करने वाला, हर बात में झूठ का सहारा लेने वाला व्यक्ति न तो चिंताओं से छुटकारा प्राप्त कर पाता है न प्रभु की कृपा का अधिकार ही बना सकता है। उसका लोग तो बिगड़ता ही है, वह परलोक-सुख एंव मु ित के अधिकार से भी वंचित हो जाया करता है।
सत्य-व्यवहार एंव वचन को आखिर तप क्यों कहा गया है? इस प्रश्न का उत्तर सहज-सरल है कि विश्व में प्रेम और सत्य मार्ग पर चल पाना खांडे की धार पर चल पाने समान कठित हुआ करता है। सत्य के साधक और व्यवहारक के सामने हर कदम पर अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उसके अपने भी उस सबसे घबराकर अक्सर साथ छोड़ दिया करते हैं। सब प्रकार के दबाव और कष्ट झेलते हुए सत्य के साधक और उपासक को अपनी राह पर अकेले ही चलना पड़ता है। जो सत्यराधक इन सबकी चिंता न करते हुए भी अपनी राह पर दृढ़ता से स्थिर-अटल रह निरंतर बढ़ता रहता है। उसका कार्यकिसी भी प्रकार तप करन से कम महथ्वपूर्ण नहीं रेखांकित किया जा सकता। इन्हीं सब तथ्यों के आलोक के सत्य के परम आराधक कवित ने व्यापक एंव प्रथ्यक्ष अनुभव के आधार पर सत्य को सबसे बड़ा तप उचित ही कहा है।

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