करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान

इसकी व्याख्या इस प्रकार है कि निरंतर परिश्रम करते रहने से असाध्य माना जाने वाला कार्य भी सिद्ध हो जाया करता है। असफलता के माथे में कील ठोककर सफलता पाई जा सकती है। जैसे कूंए की जगत पर लगी सिल (शिला) पानी खाींचने वाली रस्सी के बार-बार आने-जाने से, कोमल रस्सी की रगड़ पडऩे से घिसकर उस पर निशान अंकित हो जाया करता है। उसी तरह निरंतर और बार-बार अभ्यास यानि परिश्रम और चेष्टा करते रहने से एक निठल्ला और जड़-बुद्धि समझा जाने वाला व्यक्ति भी कुछ करने योज्य बन सकता है। सफलता और सिद्धि का स्पर्श कर सकता है। हमारे विचार में कवि ने अपने जीवन के अनुभवों के सार-तत्व के रूप में ही इस तरह की बात कही है। हमारा अपना भी विश्वास है कि कथित भाव ओर विचार सर्वथा अनुभव-सिद्ध ही है।
ऐसे किंदवतीं अवश्य प्रचलित है कि कविवर कालिदास कवित्व-शक्ति प्राप्त करने से पहले निपट जड़मति वाले ही थे। कहा जाता है कि वन में एक वृक्ष की जिस डाली पर बैठे थे, इस बात की चिंता किए बिना कि कट कर गिरने पर उन्हें चोट आ सकती या मृत्यु भी हो सकती है। उसी डाली को काट रहे थे। विद्योतमा नामक विदुषी राजकन्या का मान भंग करने का षडय़ंत्र कर रहे तथाकथित विद्वान वर्ग को वह व्यक्ति (कालिदास) सर्वाधिक जड़मति और मूख लगा। सो वे उसे ही कुछ लाभ-लालच दें, कुछ ऊटपटांक सिखा-पढ़ा, महापंडित के वेश में सजा-धजाकर राजदरबार में विदुषी राजकन्या विद्योत्मा से शास्त्रार्थ करने के लिए ले गए। उस मूर्ख के ऊटपटांग मौन संकेतों की मनमानी व्याख्या षडय़ंत्रकारियों ने एक विदुषी से विवाह करा दिया। लेकिन प्रथम रात्रि को वास्तविकता प्रकट हो जाने पर पत्नी के ताने से घायल होकर ज्यों घर से निकले कठिन परिश्रम और निरंतर साधना रूपी रस्सी के आने-जाने से घिस-घिसकर महाकवि कालिदास बनकर घर लौटे। स्पष्ट है कि निरंतर अभ्यास ने तपाकर उनकी जड़मति को पिघलाकर बहा दिया। जो बाकी बचा था, वह खरा सोना था।

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